न मेढकों की शादी से बारिश होगी, न विभाग का नाम बदलने से

 

इन दिनों जब मध्य प्रदेश में मंत्री महोदय मेढ़कों की शादी करवा रहे हैं, ताकि बारिश जल्द हो, बिहार की राजधानी पटना में पूर्वी राज्यों के प्रतिनिधि ग्लोबल वार्मिंग और मौसम पर पड़ने वाले इसके कुप्रभाव की चर्चा करने और इसका समाधान तलाशने के लिए जुटे हैं. यह सरकारों के एप्रोच का फर्क है. एक सरकार का नुमाइंदा अपने आवाम को पुरातनपंथी सोच की तरफ ले जाने की कोशिश में है, तो दूसरी सरकार का मुख्यमंत्री कह रहा है, बिहार में लगातार बारिश कम हो रही है. हम पर्यावरण का कम नुकसान करने के बावजूद मौसमी बदलाव का खमियाजा भुगत रहे हैं. फरक्का के कारण गंगा मर रही है. राष्ट्रीय जलमार्ग में जहाज फंस जा रहे हैं.

 

बिहार के पर्यावरण एवं वन विभाग द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में देश के छह पूर्वी राज्यों बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, पश्चिम बंगाल और असम के प्रतिनिधि पहुंचे हैं. इन राज्यों की एक जैसी चिंता है. बाढ़ और सुखाड़. देश और दुनिया के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में इन राज्यों की भले ही कम भूमिका रही हो, मगर ये भी जलवायु परिवर्तन का असर झेलने को अभिशप्त हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मौके पर कहा है कि कभी बिहार में औसत वर्षा 12-15 सौ मिमि होती थी, जो अब घट कर 920 पर पहुंच गयी है. नदियां गाद से भरी हैं, इसकी वजह से कम बारिश में भी प्रलयंकारी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. किसान परेशान हैं, उन्हें समझ नहीं आ रहा, कब फसल की रोपणी करें और कब पानी दें.

 

कभी 12-15 जून तक बिहार में मानसून आ जाता था, इस साल यह तारीख 27 जून तक पहुंचने वाली है. किसान इंतजार में हैं कि कब पानी गिरे और बिचड़ा लगायें. जबकि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में बाढ़ आ चुकी है.

 

मौसमी बदलाव एक सच्चाई है और इसका मुकाबला वैज्ञानिक सोच से ही किया जा सकता है. हमें इसके कारणों को समझना पड़ेगा और संतुलन कायम करते हुए बीच का रास्ता निकालना पड़ेगा. मगर दुखद तथ्य है कि खुद बिहार सरकार का पर्यावरण के प्रति नजरिया बहुत सकारात्मक नहीं है.

 

सवाल सिर्फ गंगा का नहीं है. राज्य की सैकड़ों छोटी नदियों और लाखों तालाबों का भी है. ये नदियां सूख रही हैं और तालाब भरे जा रहे हैं. इसके पीछे न सिर्फ सरकार की अनदेखी है बल्कि कई मामलों में तो सरकार खुद इस तरह के आपराधिक कृत्यों में शामिल है. पिछले दिनों हमने एक रिपोर्ट में सिलसिलेवार तरीके से बताया था कि किस तरह सरकार खुद ही बड़े और ऐतिहासिक तालाबों को भरवाकर वहां बिल्डिंग खड़े कर रही है. नदियों के पीछे सरकार की तटबंध समर्थक नीतियां जिम्मेदार हैं ही.

 

इसलिए विभाग के नाम को वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग रख देने से काम नहीं चलेगा. जिस गंभीरता का परिचय इस सम्मेलन में दिया जा रहा है, उसे जमीन पर भी उतारना होगा. यह ठीक है कि हमारी सरकार को मालूम है जलवायु परिवर्तन का सामाधान मेढकों की शादी में नहीं है. मगर नाम बदलने में भी नहीं है.

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