नीतीश जी आखिर किस मुंह से दरभंगा-मधुबनी आ जाते हैं?

आदित्य मोहन झा

मुझे सच में ये समझ में नहीं आता कि नीतीश जी किस मुंह से मधुबनी-दरभंगा आ भी जाते हैं, विकास का कौन सा ढोल ये लोगों को सुनाना चाहते हैं. क्षेत्र में कृषि लगभग बन्द हो चुकी है, पलायन चरम पर है, शिक्षा का स्तर निम्नतम है और मेडिकल सुविधाओं के हालात मरीज को और बीमार ही बना देता है. एक भी बन्द पड़ा चीनी मिल ये शुरू नहीं करवा पाए अब तक, न अशोक पेपर मिल, न जुट मिल, न सूत मिल. रोजगार का एक साधन नहीं है क्षेत्र में, स्कूल्स और कॉलेजों में इंफ्रास्ट्रक्चर व पढ़ाई का स्तर इतना घटिया है की बच्चों का भविष्य राम भरोसे है. पांच साल पहले जो सड़कें बनी थी वो अब टूट चुकी है और मरम्मत के इंतजार में है, बाढ़ से पीड़ित और विस्थापित हुए क्षेत्र के लोग अब तक मुआवजा के रकम का इंतजार कर रहे हैं, पैसे का गबन हुआ है और घोटाले की रकम अबूझ है.

मुख्यमंत्री जी आज मधुबनी में हैं, कई नई घोषणाएं करेंगे, बहुत शिलान्यास और भाषण-जयजयकार होगा. पर पिछले 12 साल में उनके पहले किए कई घोषणाएं व मांग अब तक इंतजार कर रही है शुरुआत की.

लोहठ चीनी मिल, पंडौल सूत मिल, मिथिला पेंटिंग ट्रेनिंग सेंटर, सौराठ पुरातत्व यूनिवर्सिटी, लोककला शिक्षण केंद्र, मधुबनी आकाशवाणी केंद्र, केंद्रीय विद्यालय, सकरी फ़ूड पार्क, राजनगर पर्यटन केंद्र, मखाना प्रोसेसिंग पार्क, मछलीपालन डेवलपमेंट हब जैसी कई घोषणाएं उन्होंने अबतक विभिन्न मौकों पर की है और इस सब से क्षेत्र के विकास का कायाकल्प भी हो सकता है. पर ये हर बार आते हैं हेलीकॉप्टर से और भषनिया के चल देते हैं.

ये वो इलाका है, जहां थोड़ा विजन और मेहनत खर्च हो तो हालात एकदम बदल सकता है, पर इनसे कुछ नहीं हो पाया. मिथिला पेंटिंग और लोककला को अगर डेवलप किया जाता, ट्रेनिंग और लोन उपलब्ध करवाए जाते तो स्वरोजगार का एक जबरदस्त विकल्प बन सकता था. सिर्फ चीनी मिल और जूट-सूत मिल खुलवा लेते तो रोजगार भी उत्पन्न होता और कृषि-किसान की हालत भी सुधर जाती. ये क्षेत्र जल बहुतायत वाला है जहाँ मत्स्य-पालन, मखाना, सिंघाड़ा हब बनाने की असीम सम्भवना है. पान-मेडिकल हर्ब्स-फूल आदि की खेती यहाँ के आर्थिक समृद्धि का रास्ता खोल सकती है जिसके लिए जरूरत थी की लोगों को ट्रेनिंग-साधन-जानकारी-लोन उपलब्ध करवाया जाता.

डेयरी-कुक्कुटपालन-पशुपालन आदि में सरकारी मदद क्षेत्र की आर्थिक व्यवस्था को एक नए सोपान पर ले जाता. बलिराजगढ़-राजनगर-उगना महादेव-कुशेश्वरस्थान आदि को स्थानीय पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता था. लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं हो पाया आजतक.

ये सिर्फ दहेजमुक्त-दारुबन्दी जैसे चीजों का जयजयकार करवाएंगे, आज मधुबनी का कोना-कोना सजवा दिया गया है, प्राइवेट स्कूल्स को भी बंद करवाकर उनके बसों को सभा के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. चप्पे-चप्पे पर पुलिस है, प्रशासन ने बैनर और पोस्टर से इलाका पाट दिया है. बसों-ट्रैक्टरों में लोग भरके लाए जाएंगे, भेड़-बकरियों की तरह हांके और चराए जाएंगे. घोषणाएं होंगी, तालियां बजेंगी, नारे लगेंगे, फ़ोटो खीचेंगी, न्यूज पेपर्स और खबरों में यही चलेगा. और फिर अजीमो शान शहंशाह हेलीकॉप्टर में बैठ के उड़ जाएंगे. सभा उजैड़ जैत, रहि जैत गाछी.

 

पढिये, लेखक का एक और पोस्ट-  “बुझलियै, रैय्याम चीनी मील खुजै बला छै”

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