नीतीश जश्न में डूबे रहे और पब्लिक सरकारी लापरवाहियों के भंवर में

बिहार कवरेज डेस्क

एक बिहारवासी के तौर पर साल 2017 को जब याद करता हूं तो न चाहते हुए भी यही हेडिंग सामने आ जाता है. मैं बार-बार चाहता हूं कि इस हेडिंग को बदल दूं, किसी पॉजिटिव नोट के साथ इस साल को खत्म करूं. मगर वह हो नहीं पाता है. क्योंकि सच यही है, पूरे साल बिहार की सरकार जश्न और जलसा मनाती रही. चाहे प्रकाश पर्व का जश्न हो, मानव श्रृंखला का जश्न हो, चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष का जश्न हो, बिहार दिवस का जश्न हो, नये संग्रहालय बनने का जश्न हो, और कई छोटे-बड़े जश्न हों. साल का आखीर भी एक जश्न से ही हो रहा है.

प्रकाशपर्व के समापन का जलसा. मगर इस जश्न और जलसे से बिहार की जनता को क्या मिला. कभी नाव पलटने से डूबी, तो कभी बाढ़ में, कभी झुलस कर तो कभी आपदाओं से, कभी अस्पताल में हड़ताल से तो कभी हादसों में. विडंबना यह हुई कि जश्न में डूबी सरकार ने कभी आपदाओं में फंसी जनता के दुःखों का ख्याल नहीं किया. उल्टे यह शिकायत की कि जनता इस जश्न का भागीदार क्यों नहीं बनती. तो इस ईयर-एंडर की शुरुआत इसी नोट से कर रहा हूं. चार भागों में लिखे जाने वाले इस ईयर-एंडर का पहला भाग आपके सामने है, जो पहली तिमाही यानी जनवरी-फरवरी मार्च की घटनाओं की याद दिलायेगा.

1. गुरु गोबिंद सिंह का 350 वां प्रकाशपर्व-

बिहार में साल 2017 की शुरुआत प्रकाशपर्व से होती है. एक जनवरी से शुरू हुआ यह भव्य आयोजन पांच जनवरी तक चला. गांधी मैदान इससे पहले कभी इतना खूबसूरत नहीं लगा था, जितना उन पांच दिनों में था. उसे टेंट सिटी का रूप दिया गया था, जहां टेंटों में हर तरह की सुविधाएं थीं. बेड, हीटर, गर्म पानी, शौचालय. इसके अलावा टेंट का गुरुद्वारा बना, तीन लंगर सजे जिसमें आम भोजन से लेकर पिज्जा तक बंटा. इसके अलावा पटना सिटी के इलाके में भी दो टेंट सिटी बने. दुनिया भर से सिख संगतों को न्योता भेजा गया.

कई नयी बसें चलीं जो आज भी राज्य के दूसरे इलाकों में यात्रियों को ढो रही हैं. ‘जी आया नू’ स्लोगन के साथ पूरे शहर में सीएम नीतीश कुमार के होर्डिंग लगे. भव्य आयोजन में पीएम नरेंद्र मोदी पहुंचे. यह अलग बात है कि उस आयोजन में सरकार के मुख्य सहयोगी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद को जमीन पर बिठा दिया गया, जिसकी चर्चा राजनीतिक हलकों में जी भर कर हुई. मगर यह एक सफल इवेंट था. दुनिया भर के सिखों ने इस सफल और शानदार इवेंट के लिए नीतीश की जी भरकर तारीफ की और उनकी जोरदार ब्रांडिंग हुई.

2. पतंग महोत्सव में नौका दुर्घटना

इस आयोजन के ठीक दस दिन बाद पटना में एक ऐसा हादसा हुआ जिसने बिहार सरकार की व्यवस्थाओं के मुंह पर कालिख पोत दी. पर्यटन विभाग ने मकर संक्रांति के मौके पर गंगा के बीच में बने टापू में पतंग महोत्सव का आयोजन कराया. हजारों लोगों को नावों पर भर-भर कर वहां पहुंचाया गया. मगर आते वक्त नावों का टोटा पड़ गया. वहां जो लोग फंसे थे वे नावों पर भारी संख्या में लद कर लौटने लगे.

ऐसे में दो नावों टकरायी और लोग डूबने लगे. इस हादसे में 24 लोगों की मौत हो गयी. हादसे के बाद कई ऐसे तथ्य सामने आये जिससे साबित हुआ कि आयोजकों ने भीषण किस्म की लापरवाही बरती थी, जिस वजह से इतने लोग अकाल कलवित हुए. महज दस रोज पहले आयोजन की बेहतरीन व्यवस्था करने वाली बिहार सरकार की इस मौके पर भारी फजीहत हुई.

नौका हादसा के बाद लोगों को बचाने की कोशिश

3. शराबबंदी के पक्ष में मानव श्रृंखला

पतंग महोत्सव में दो दर्जन लोगों की मौत और भारी फजीहत के बावजूद बिहार सरकार और उसके मुखिया नीतीश कुमार के सिर पर से जश्न मनाने का भूत नहीं उतरा. महज एक हफ्ते बाद एक और जश्न. यानी शराबबंदी के पक्ष में दुनिया की सबसे बड़ी मानव श्रृंखला का निर्माण. 21 जनवरी को इसकी तारीख तय थी. सरकार चाहती तो इसे बदल सकती थी. मगर वह जिद पर अड़ी रही.

आखिरकार मानव श्रृंखला बनी. इसमें राज्य के स्कूल के शिक्षकों को जोत दिया गया. स्कूलों से पकड़-पकड़ कर बच्चों को हाइवे, राज्य मार्गों और पुल-पुलियों, यहां तक कि चचरी के पुलों पर भी खड़ा कर दिया गया. इसके लिए प्रधानाध्यापकों ने बच्चों और शिक्षकों को धमकाया और कई तुगलकी फरमान जारी भी किये. जरा इसकी एक तसवीर देख लीजिये.

मानव श्रृंखला के रिकार्ड के लिए अररिया में बच्चों को चचरी पुल पर भी चढ़ा दिया गया.

 

4. कमल में रंग भरते नीतीश

चार फरवरी को 2017 का पहला पटना पुस्तक मेला शुरू हुआ. यह मेला जो गांधी मैदान में लगा था. कई वजहों से चर्चित रहा. मगर इसके चर्चा में आने की सबसे बड़ी वजह थी नीतीश कुमार की यह तसवीर जिसमें वे कमल में रंग भरते नजर आ रहे थे. इसको लेकर राजनीतिक हलकों में कयासों का सिलसिला शुरू हो गया. क्योंकि उस वक्त तक नीतीश महागठबंधन में लालू जी के साथ थे.

किस्सा यह था कि एक आर्ट एक्जीविशन में पद्म पुरस्कार से सम्मानित बौआ देवी के बनाये चित्र में रंग भर कर उन्हें आयोजन की शुरुआत करना था. ऐन आयोजन के वक्त कैनवास का स्टैंड टूट गया. हड़बड़ी में बौआ देवी को कुछ सूझ नहीं रहा था तो नीतीश जी ने कह दिया कोई फूल बना दीजिये. बौआ देवी ने भी भाजपा का निशान कमल फूल बना दिया. नीतीश ने भी मुस्कुराते हुए उस फूल को रंग दिया. बाद के दिनों में हमने देखा कि वे खुद कमल के रंग में रंगे हुए थे.

5. पुल के लिए पखवारे भर का अनशन

वैसे तो बिहार में लगभग हर मौसम में किसी न किसी कोने में लोग अपने हक के लिए लड़ते रहते हैं, मगर खगड़िया जिले के फरकिया में हुआ यह अनशन अपनी हृदय विदारक तसवीर की वजह से नेशनल न्यूज बन गया. लोग एक पखवारे से अनशन कर रहे थे, उन्हें अनशन स्थल पर ही स्लाइन चढाई जा रही थी. स्लाइन चढ़ी बोतलों के साथ लोगों की यह तसवीर लोगों को इस संघर्ष से जोड़ने लगी. मजबूर होकर सरकार को पुल का वादा करना पड़ा. आइये, इस तसवीर को देखें…

6. बिहार दिवस

इस तिमाही के आखिर में 22, 23 और 24 मार्च को एक और जलसा सरकार की तरफ से हुआ. बिहार दिवस का. पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में यह जलसा गीत और संगीत के साथ चला. इस मौके पर बिहार के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सभी स्कूलों और कॉलेजों के लिए फ्री वाई-फाई की घोषणा कर दी. पता नहीं यह घोषणा पूरी हुई भी या नहीं.

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