‘निर्भया फंड के खाते में पड़े हैं ढाई हजार करोड़, दर-बदर भटक रही पीड़िताएं’

निर्भया कांड की आज पांचवीं बरसी है. वैसे तो देश में हर साल ऐसी दसियों जघन्य घटनाएं होती रही हैं, मगर इस घटना का महत्व इसलिए है कि इसने देश की सामूहिक चेतना को झकझोरा. हमें यह सोचने के लिए बाध्य किया कि सड़क पर अकेली किसी भी काम से निकली लड़कियों की सुरक्षा की गारंटी क्यों न हो. इसी मकसद से कानून में बदलाव हुए और इन लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्भया फंड बना. दिक्कत यह है कि सरकार निर्भया फंड बनाकर इसे भूल गयी है. इसके खाते में जमा पैसा खर्च नहीं हो रहा. जबकि आज भी देश की सड़कों पर हर रोज निर्भयाएं खतरे का सामना करती हैं. इन मसलों को नजदीक से देखने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के वकील और चाइल्ड राइट्स के एक्सपर्ट अनंत कुमार अस्थाना ने यह विचारोत्तेजक लेख लिखा है. आप भी पढ़ें…

अनन्त कुमार अस्थाना

आज एक और 16 दिसंबर बीत जायेगा. जब पहली बार ये 16 दिसम्बर घटा था और आक्रोश का जन सैलाब गलियों से संसद तक गूंजा था, हम सबको  लगा था कि अब ये आगे से घटित नहीं होगा. लगा था कि सरकार ने अबकी बार कमर कस ली है. एक आस जगी थी कि अब कोई सुध लेगा और हालत तेजी से बदलेंगे.

दिल्ली हाईकोर्ट के वकील और चाइल्ड राइट्स के एक्सपर्ट अनंत कुमार अस्थाना

हमें बताया गया था कि अब सुनसान अंधेरी सड़कों पर रौशनी होगी. थानों में पर्याप्त संख्या में महिला पुलिस अधिकारी तैनात की जाएंगी और न्याय व्यवस्था में तेजी से सुधार लाये जायेंगे. महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से बने कार्यक्रमों को बेहतरी से लागू किया जायेगा, इस वादे के साथ वर्ष 2013 में ही केंद्र सरकार ने एक हजार करोड़ रुपये की मूल धनराशि दे कर निर्भया फंड बनाया.

आज 16 दिसम्बर हुए पूरे पांच साल बीत जायेंगे और निर्भया फंड में पड़ी यह अगाध धनराशि से आज भी खर्च होने को तरस रही है. वित्त वर्ष 2014-15 में यह धनराशि बढ़ कर 2000 करोड़ हुई जो 2016-17 में 2550 करोड़ हुई और 2017-18 आते आते यह राशि 3100 करोड़ की हो चुकी है. इसमें से अगस्त 2017 तक केवल लगभग 650 करोड़ रुपये का ही इस्तेमाल हुआ है. शेष धन अभी भी सरकारी फाइलों में अटकी है.

अगर कुछ हुआ है तो वो बस यह कि नए कानून बना दिए गए हैं और बड़ी बड़ी योजनाओं की घोषणाएं कर दी गयीं.  इन नए कानूनों के कायदे से लागू होने के आसार अभी दूर-दूर तक नज़र नहीं आते और रही बात योजनाओं की तो ऐसा लगता हैं कि महिला सुरक्षा के नाम पर बने इतने विशाल बजट को इस्तेमाल करने के लिए न तो सरकार के पास कोई सुनोयोजित नीति है और न ही कोई दर्शन.

बताते चलें कि निर्भया फंड में पड़े कुल पैसे में से 2200 करोड़ रुपये की लागत के कुछ 22 कार्यक्रम सरकार ने अभी तक चिन्हित किये हैं, जिनमें से अधिकांश अभी केवल प्रस्ताव के स्तर पर ही हैं. महिलाओं की ज़रूरतों का न तो कोई व्यवस्थित आंकलन किया गया है और न ही महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों के लागू होने में मौजूद आर्थिक अडचनों का कोई संज्ञान लिया गया है.

फौरी तौर पर अलग-अलग मंत्रालयों (जैसे गृह, रेलवे, महिला एवं बाल विकास, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक), और कुछ राज्य सरकारों (जैसे आंध्रप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, उत्तराखंड, कर्नाटक, ओडिशा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश) के कार्यक्रमों के लिए निर्भया फंड से पैसा आबंटित करने का प्रस्ताव है. यहाँ वहां एक दो कार्यक्रम ज़रूर ऐसे हैं, जिनसे व्वस्थागत सुधार आने की और मौजूदा कानूनों का लाभ पीड़ितों को मिलने कि उम्मीद की जा सकती है. जैसे, गृह मंत्रालय का 200 करोड़ राशि का केंद्रीय पीड़ित क्षतिपूर्ति कोष.

लेकिन कई कार्यक्रम तो ऐसे हैं, जो विशुद्ध राजनितिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित दिखते हैं. जैसे, दिल्ली पुलिस को सामाजिक कार्यकर्ता और काउंसलर उपलब्ध करवाने से सम्बंधित प्रस्ताव, जो असल में दिल्ली राज्य में पहले से ही चल  रहे प्रयासों के सामानांतर चलने वाला एक प्रकल्प ही होगा.

एक तो पांच साल गुजर जाने के बावजूद इस फंड का अभी तक इस्तेमाल में न आ पाना अपने आप में एक चिंता का विषय तो है ही, उससे भी ज्यादा चिंता अब इस बात की होनी चाहिए कि आखिर निर्भया के नाम को समर्पित कोष, असल उदेश्यों के लिए खर्च हो भी पायेगा या नहीं या फिर ऐसे ही यत्र तत्र सर्वत्र बिखर के रह जायेगा.

 

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