नथुने में गोबर की गंध जाते ही याद आता है, अरे आज तो कोई त्योहार है

मिथिलेश कुमार राय

मिथिलेश कुमार राय

गोबर का जिस अर्थ में प्रयोग गुड़ के साथ होता है या गणेश के साथ, गांव में यह वैसा ही नहीं रह जाता है. गुड़ अपनी जगह ठीक है और गनेश तो हैं ही. लेकिन यहां गोबर भी इससे कम महत्व का नहीं होता. विश्वास न होता हो तो त्योहार के दिनों में बगल के किसी गांव में घूम आइए.

गोबर के वैसे तो बहुत से काम होते हैं. जैसे इसका उपले थोप लीजिये. इसे सड़ा कर खाद बना लीजिए. गोब गैस की परिकल्पना तो है ही. लेकिन त्योहार के दिनों में इसका महत्व देखते ही बनता है.

घर अगर पक्की ईंट का बन भी गया हो तब भी आँगन का क्या. वह तो मिट्टी का ही है. और दालान. वह भी. त्योहार-त्योहार को इन्हें गोबर से जरूर लीपा जाएगा. नहीं तो त्योहार कैसा. लगेगा ही नहीं कि त्योहार आ गया है. गोबर से न लीपो तो जैसे त्योहार आँगन में उतरेगा ही नहीं. त्योहार के दिन जगते ही गोबर से लीपे आँगन से जो एक गंध निकलती है, उसके नथुने में जाते ही भक्क से याद आ जाता है कि आज त्योहार है.

त्योहार के दिन एक गोबर ही तो है जिसकी सबको जरूरत होती है. त्योहार के दिन पशु-धन वाली को देख लीजिए. लगेगा कि हाँ, उसके पास भी कुछ है. इस दिन वह दूसरे को गोबर दान करती हैं और संतुष्ट होती हैं. खुश होती हैं. उन्हें थोड़ा सा गर्व भी होता है. बड़े-बड़े आँगन से लोग गोबर माँगने आते हैं. वह बांटती जातीं हैं और खुश होती जातीं हैं. कई लोग तो पशु-धन वालियों को थोड़ा सा गोबर उनके लिए भी रखने का मनुहार त्योहार आने से एकदिन पहले से ही करने लगते हैं.

त्योहार के दिन सुबह जल्दी हो जाती हैं. आँगन लीपने का एक्स्ट्रा काम रहता है सबके सिर पर. फिर गोबर की पहरेदारी भी करनी पड़ती हैं. पशु-धन न हो तो गोबर का इंतज़ाम भी करना पड़ता है. देर हुई तो फिर हाथ मलने और गाय के गोबर देने का इंतज़ार करना पड़ता है. लीपने में देर होने का मतलब है कि शेष सारे कामों में भी देर होना.

सिर्फ फूल ही नहीं, त्योहार के दिन गोबर चुरा लेने की भी यहां प्रचलन है. सवेरे उठो तो पता चलेगा कि बथान पर गोबर है ही नहीं. यह देखकर देह में आग लग जाती है और पारा सातवें आसमान पर चला जाता है. तभी अगर कोई बाल्टी लिए आ जातीं है कि बहन, कल बोला था कि थोड़ा सा गोबर हमारे लिए भी रखना. लाओ. फिर देखिए तमाशा. कहाँ से दे दूं. आधी रात को ही सारा उठाकर सौत ले गई. फिर सुनिए. हमेशा घूंघट से अपने चेहरे को ढँककर रखने वालियों के बोल. अभी पौ भी नहीं फटा है. ब्रह्म मुहूर्त है. खूब समझाने के बाद ही भुनभुनाहट बंद होती है.

गोबर कौन ले गई. यह किसी ने नहीं देखा. लेकिन सब कहेंगी कि वे सब जानतीं हैं. आज त्योहार नहीं रहता तो पता चला देतीं. कहो तो, माँगती तो न देती. मैंने जिसको गोबर नहीं दिया होगा, उसका तो आँगन शुद्ध नहीं हुआ होगा. और भी न जाने क्या-क्या.

लेकिन जैसे-तैसे सब हो जाता है. सबका आँगन लीपा जाता है. सबके आँगन में त्योहार उतर आता है. सब त्योहार मनाते हैं. जब पशु-धन हो दरवाजे पर तो गोबर की आस हर पल बनी रहती है. कुछ देर-सवेर संभव है पर बाल्टी खाली नहीं रहती. वह गोबर से भर ही जाती है!

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