नई एमएसपी राहत तो देगी, मगर डेढ़ गुना वाली बात भद्दा मजाक है

मोदी सरकार ने किसानों के उपज की एमएसपी बढ़ा दी है. यह एमएसपी सौ-दो सौ टका बढ़ा कर सरकार कह रही है कि अब किसानों को उसकी लागत का डेढ़ गुना मिल जायेगा. हालांकि आज देश के किसान जिस स्थिति में हैं, उसमें उन्हें जो भी मिल जाये वह लाभ ही है. मगर यह कहना कि उन्हें उनकी लागत का डेढ़ गुना मिलेगा एक क्रूर मजाक है. दुखद तो यह है कि सरकार ने ऐन चुनावी साल में ऐसी घोषणा करते हुए यह भी नहीं बताया कि उन्होंने किसानों की लागत का निर्धारण किस आधार पर किया है.

अब जैसे धान की ही बात ली जाये. सरकार ने सामान्य धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1750 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है. यह पहले 1550 रुपये था. सरकार कह रही है कि किसानों की प्रति क्विंटल लागत 1166 रुपये है. दिलचस्प है कि 2006 में स्वामिनाथन कमिटी ने जो रिपोर्ट दी थी उसके मुताबिक प्रति क्विंटल धान उपजाने की लागत 1660 रपये बतायी थी. दरअसल यह नजरिये का फर्क है. सरकार जहां सिर्फ किसानों के खर्च को जोड़ती है, वहीं स्वामिनाथन आयोग ने इस खर्च में जमीन का किराया और परिवार के लोग जो साल भर खेती में लगे रहे उसका मेहनताना भी जोड़ा.

यह इसलिए भी जरूरी है कि आज की तारीख में मेरे अनुमान से तीन चौथाई खेतिहर जमीन लीज पर लेकर खेती कर रहे हैं, हो सकता है मेरा अनुमान गलत हो. मगर जितने भी लोग जमीन लीज पर लेकर खेती करते हैं, वे गरीब तबके के किसान होते हैं और जाहिर सी बात है कि उनकी लागत जमीन वाले किसानों के मुकाबले अधिक होती है. अगर कोई अपनी जमीन पर खेती करता है तो उसे भी तो जमीन का लाभ मिलना चाहिए. इसके अलावा अगर कोई पूरा परिवार खेती के काम में ही फंसा रहता है तो उसकी मजदूरी को क्यों नजरअंदाज किया जाना चाहिए.

हालांकि सरकार जिस 1166 को लागत बता रही है वह भी गलत है. क्योंकि आज औसतन एक एकड़ जमीन में 20-25 क्विंटल धान उपजता है. 22 को औसत मानें तो 25 हजार 652 रुपये में एक एकड़ जमीन की खेती मुमकिन है. बीज, खाद, तीन बार सिंचाई, मजदूरी. लोग कट-मर कर, कतर ब्योंत करके खेती करते हैं ताकि लागत बचा सकें. तीन साल पहले जब मैं आरा के इलाके में गया था तभी वहां के किसानों ने कहा था कि वाजिबन धान की कीमत 2400 रुपये प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए.

हालांकि अगर यह बात आज कह दी जाये तो शहरी उपभोक्ता वर्ग बवाल मचा देगा. मगर यह सच है कि हम लोग धीरे से न जाने कब 40-50 रुपये किलो की दर वाला चावल खाने लगे हैं. मगर किसान अपना धान आज तक 1550 रुपये में बेचता है. वह भी अगर सरकारी खरीद में चांस भिड़ गया तो. क्योंकि बिहार में पैक्स को धान बेचना आज भी टेढ़ी खीर है.

इसके बावजूद यह कहना गलत है कि कुछ नहीं हुआ. धान के 1750 रुपये में बिकने से किसानों को कुछ तो राहत मिलेगी ही. मगर डेढ़ गुना मिलने की बात एक भद्दा मजाक है, इससे किसान चिढ़ेंगे और नाराज होंगे.

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