तो क्या मोदी अविजेय हैं?

व्यालोक पाठक

पत्रकार एवं टिप्पणीकार व्यालोक पाठक

एक शब्द में इसका एक जवाब हो सकता है – नहीं. आखिर, हमारे पास दिल्ली और बिहार के नतीजे हैं दिखाने को. बिहार में तो चलिए डेढ़ साल बाद ही सही, पर अपने पुराने साथी नीतीश कुमार के साथ मिलकर भाजपा ने सरकार में साझीदारी तो कर ली है. दिल्ली का नासूर तो रह-रहकर प्रधानमंत्री के कलेजे में भी टीस देता ही होगा.

यह बात भी दीगर है कि मई 2014 से अब तक जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनको टीवी चैनलों और आरामकुर्सी पर पसरे विशेषज्ञों ने मोदी सरकार और प्रधानमंत्री के कामकाज पर ही जनादेश माना है. चैनलों के हिसाब से अगर चलें, तो प्रधानमंत्री को कम से कम दो दर्जन बार इस्तीफा तो दे ही देना चाहिए था. गुजरात चुनाव तो वैसे भी नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी के लिए लिटमस-टेस्ट थे. आखिर, हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने से लेकर प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनने तक, मोदी की तमाम खूबियों और खामियों का खेवनहार तो गुजरात ही रहा है.

गुजरात चुनाव और उसके नतीजों की तुलना अगर किसी और पार्टी या राज्य में सत्ता से की जा सकती है, तो वह पश्चिम बंगाल में वामदलों की सरकार से. वाम-मोर्चे की सरकार भी तब नहीं संभल सकी, जब दिग्गज नेता ज्योति बसु ने गद्दी छोड़ी थी. महज एक टर्म के बाद ही वहां सत्ता में ममता बनर्जी आ गयीं. गुजरात में भाजपा लगातार 22 वर्षों से सत्ता में है. यहां साथ ही हिमाचल प्रदेश के नतीजों पर भी एक नज़र दे डालिए. वहां पांच वर्ष के बाद ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर हो जाना पड़ा.

इसके अलावा, गुजरात में दलित हितों की नुमाइंदगी करते जिग्नेश, पाटीदारों के लिए आवाज़ उठाकर नायक बने हार्दिक पटेल और ओबीसी के युवा नेता अल्पेश ठाकोर भी कांग्रेस के ‘युवा अध्यक्ष’ राहुल गांधी के नेतृत्व में एक साथ, एक प्लेटफॉर्म पर आ चुके थे, मोदी-विरोधी गठबंधन बनाकर, जीएसटी और नोटबंदी जैसे अलोकप्रिय कदमों का सामना मोदी (भाजपा) कर ही रहे थे और बावजूद इन सबके, लगभग 50 फीसदी मतों और 100 सीटों के साथ गुजरात में भाजपा लगातार छठी बार सरकार बनाने जा रही है.

तो, इसे क्या माना जाए? मोदी का चमत्कार? या कि, विपक्ष के साफ होने की इबारत दीवार पर साफ-साफ लिख दी गयी है. थोड़ी दूरी से और ठहरकर विश्लेषण करें तो, बात इतनी आसान नहीं है और दोनों ही स्थितियां आधी सच हैं. आखिर, राहुल गांधी के ही नेतृत्व में कांग्रेस ने अपना वोट-शेयर भी गुजरात में बढ़ाया है और सीटें भीं. सच पूछा जाए, तो सुबह में कुछ देर के लिए तो भाजपा के मजबूत से मजबूत समर्थक का भी पेट डोल गया था. कांग्रेस को आयी सीटें बताती हैं कि उसने बेहतर प्रदर्शन तो किया, लेकिन कई मौकों को वोट में बदल नहीं पायी.

गुजरात की तिकड़ी हार्दिक, अल्पेश औऱ जिग्नेश

दरअसल, इस देश की राजनीति में 2014 से ही खलल पड़ गया. नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी ने 2014 में सोशल मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया, युवाओं को खुद से जोड़ने में वह कामयाब रहे और वहीं यह ‘परसेप्शन’ भी बना कि ‘गुलाबी क्रांति’ अब इंडिया गेट से भी दूर नहीं. केजरीवाल की दिल्ली में आशातीत सफलता ने इसे और भी मजबूत कर दिया. उसके बाद तो प्रशांत किशोर और टीम की चांदी हुई, बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार की सफलता ने तो मानों चुनावी लड़ाई को बूथ और ज़िले से उठाकर सोशल मीडिया और की-बोर्ड तक ही ला दिया.

यहीं चूक हुई. भारत जैसे मेल्टिंग पॉट वाले देश में सोशल-मीडिया के जरिए चुनाव लड़ना वैसा ही है, जैसे नखलिस्तान के सपने मात्र के भरोसे सहारा का रेगिस्तान पार करने पर आमादा हो जाना. सोशल मीडिया आपको समाज के एक हिस्से का हाल दिखाता है, वह नब्ज पर उंगली रख सकता है, लेकिन असली लड़ाई तो झुग्गी झोपड़ियों, चाय के ठीयों और बूथ-लेवल पर ही होता है. अमित शाह एंड कंपनी ने इसी का ख्याल रखा. चुनाव में कूदने के पहले जीएसटी की दरों में सुधार या समीक्षा कर डैमेज-कंट्रोल किया गया. परिणाम देखिए. सूरत, अहमदाबाद, वड़ोदरा आदि सभी व्यापारिक शहरों में भाजपा फायदे में ही रही है.

22 साल से सत्ता में रहते-रहते जो कल-पुरजे ढीले हो गए, लगातार अहमदाबाद और गांधीनगर में कैंप कर अमित शाह ने उनको कसा. उनके विरोधी प्रधानमंत्री की सभा की खाली कुर्सियों को ही गिनते रह गए. सोशल मीडिया या सभाओं की जमा भीड़ को देखकर हार्दिक या जिग्नेश को नेता समझना बलिहारी थी, चुनाव-प्रबंधकों की.

मोदी को हराने के लिए फिर, उसी स्टेचर का माहिर नेता भी तो लाना पड़ेगा. जब राहुल बाबा, पिछले कई चुनावों से आसपास भी नहीं पहुंच पा रहे, तो इन बैसाखियों को लेकर दौड़ने की उम्मीद ही बेमानी थी.

राहुल गांधी की मासूमियत तब हास्यास्पद हो जाती है, जब वह या उनके प्रबंधक सोचते हैं कि मंदिरों का चक्कर लगाकर या टीका थोपकर वे भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीन लेंगे. भाजपा ने सच पूछिए तो पिछले सात दशकों से हिंदुत्व को पाला-पोसा है. उनसे यह मुद्दा छीनना किसी इंस्टैंट नूडल बनाने की तरह आसान तो नहीं ही होगा न. राहुल गांधी पैराशूट से उतरे थे, जबकि मोदी-शाह के लिए वो दंगल की मिट्टी थी.

भाजपा के पक्ष में यह बात गयी कि वह जनता को यह समझाने में सफल रही कि परस्पर विरोधी तीनों नेता (अल्पेश, हार्दिक ओबीसी की लड़ाई लड़ रहे थे, जबकि जिग्नेश दलित हितों की. यह बात अलग है कि ऊना के तथाकथित पीड़ित यूपी चुनाव के समय ही संघ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे) भले ही राहुल के साथ मंच पर हों, लेकिन यह परस्पर विरोधाभासी गठबंधन ही है.

यह भी याद रखना होगा कि मोदी जनता को यह विश्वास दिलाने में भी सफल रहे कि वह बिना छुट्टी लिए, अनथक देश के लिए काम कर रहे हैं, जबकि उनके विरोधी उन पर निजी हमले कर रहे हैं. चुनौती को अवसर बना लेने में माहिर मोदी अकेले में जरूर मणिशंकर अय्यर और कपिल सिब्बल को याद कर मुस्कुराते होंगे.

अंतिम बात यह कि, मौजूदा राजनीति में एक से एक नए दांव लगानेवाले मोदी-शाह की जोड़ी को निपटाने के लिए उन्हीं के स्तर पर जाकर सोचनेवाला बंदा चाहिए. वह व्यक्ति कम से कम राहुल गांधी तो नहीं ही हैं.

 

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