तकलीफदेह है यह सोचना कि अब पटना में स्निग्ध जी से मुलाकात नहीं होगी

जानेमाने कविकथाकार सुरेंद्र स्निग्ध का कल निधन हो गया. वे पटना के साहित्यिक जीवन में एक जानापहचाना और आत्मीय नाम थे. पूर्णिया जिले से वास्ता रखने वाले स्निग्ध जी के जाने पर पूरे सोशल मीडिया में उदासी तारी है. इस मौके पर जानेमाने पत्रकार और फिल्म निर्देशक, हम सबके अविनाश भाई ने बहुत शार्ट नोटिस में यह दिल को छू लेने वाला स्मृति लेख लिखा है. आपके लिए

अविनाश

सुरेंद्र स्निग्ध चले गये. सबको एक दिन चले जाना होता है. लेकिन जाने की एक सम्मानजनक उम्र होती है. सुरेंद्र स्निग्ध जी थोड़ा पहले चले गये. अफ़सोस होता है कि काश किसी के जाने से पहले कोई संकेत होता तो हम उन लोगों से आख़िरी बार बेहतर ढंग से मिल पाते, जिनसे मिलना इसलिए टालते रहते हैं कि हड़बड़ी में क्या मिलना! कभी इत्मीनान से मिलेंगे, बैठेंगे, बातें करेंगे.

अविनाश दास, पहले पत्रकार, फिर फिल्मकार, सबसे अधिक एक जिंदादिल इंसान

सुरेंद्र स्निग्ध से मेरा नाता बाबा नागार्जुन की वजह से जुड़ा. शायद सन ’94 का साल था, जब बाबा मुझे लेकर दरभंगा से पटना आये थे. हम खगेंद्र जी के एमएलए फ्लैट में रुके थे. इस बार देखा तो वह फ्लैट नेस्तनाबूत था और वहां पर मल्टीस्टोरेज बिल्डिंग की नींव रखी जा चुकी थी. वहीं शाम में एक रिक्शे पर बैठ कर बाबा के साथ हम सुरेंद्र स्निग्ध जी के घर गये थे. बाबा का तो ख़ैर अपना रूटीन था, लेकिन उस रात सुरेंद्र स्निग्ध जी से काफ़ी बातें हुईं और हम भाईभाई हो गये. फिर पत्रों के जरिये मिलने का सिलसिला रहा. उन्हीं दिनों किसी पत्रिका का उन्होंने संपादन किया था, जिसमें मेरी आठदस कविताएं उन्होंने छापी थीं. यह वह दौर था, जब कविता लिखने के बावजूद कवि का सम्मान पाने के लिए युवकों के भीतर एक अलग किस्म की जद्दोजहद होती है. मेरी पत्रकारिता के सघन दिनों में भी सुरेंद्र स्निग्ध जी मुझे कवि मानते रहे.

सन ’95-’96 में जब मैं पूरी तरह से पटना रहने लगा, तो स्निग्ध जी से मुलाक़ातें बहुत कम हो गयीं. हम दूर रह कर ज़्यादा क़रीब होते हैं, लेकिन नज़दीक रहते हुए रिश्तों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. तब भी, जब कभी हम टकराते थे स्निग्ध जी के स्नेह में उतना ही ताप महसूस होता था, जैसा पहली बार महसूस हुआ था. सिर्फ एक झिड़की कि घर नहीं आते हैं आप, बहुत ग़लत बात है. वह कभी तुम नहीं कहते थे, हमेशा आप कहते थे.

वह बहुत बेहतर मनुष्य थे. मंडल आंदोलन के बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों में साहित्य में सामाजिक न्याय की बात करते हुए उन्होंने जनसंस्कृति मंच से किनारा किय, तो शहर के कई मित्रबंधुओं के लिए संदिग्ध हो गये. तब भी बिना किसी मलाल के वे हर व्यक्ति के लिए अपनी सौजन्यता निभाते रहे. दूर दराज से पटना आने वाले साहित्यकारों को ठौर देते रहे, कमज़ोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले मित्रों की आर्थिक मदद करते रहे.

कुछ साल पहले, जब मैं दिल्ली में था, मेरा छोटा भाई अरुण नारायण पटना से उनका उपन्यास छाड़नलेकर आया था. पहले तो मैंने उसे पढ़ना टाला कि स्निग्ध जी तो कवि हैं, पता नहीं उनके उपन्यास में कोई बात होगी या नहीं. फिर एक दिन यूं ही पलटने लगा और एक सांस में पूरी किताब पढ़ गया. कोसी अंचल की एक संवेदनशील सामाजिक कहानी इतने रचाव के साथ बहुत दिनों बाद पढ़ने को मिला था, तो ख़ुद को रोक नहीं पाया और स्निग्ध जी से फोन पर लंबी बात की. उनसे कहा कि यह उपन्यास आपकी तमाम किताबों पर भारी है. अब आपको किस्सागोई के मकान में बस जाना चाहिए और कविता के कमरे का दरवाज़ा बंद कर देना चाहिए. उन्होंने बस इतना कहा था कि अविनाश जी, अगर आपको अच्छा लगा है तो और लोगों को भी पढ़वाइए.

सुरेंद्र स्निग्ध फणीश्वर नाथ रेणु के अंचल से आते थे. उनके जैसा बड़ा भाई मिलना मुश्किल है. पटना पुस्तक मेले से जुड़ी उनके साथ की बहुत सारी यादें हैं. तक़लीफ़देह है यह यक़ीन कर पाना कि अब उनसे कभी मुलाक़ात नहीं होगी. उनकी स्मृति को मैं हृदय से नमन करता हूं.

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