डियर राहुल, कुछ नया नहीं हुआ, कांग्रेस कल भी उतनी ही आपकी थी, जितनी आज है

(इस पोस्ट के साथ लगी तसवीर कांग्रेस पार्टी की तरफ से ट्वीट की गयी है और पार्टी में उनकी यही असली हैसियत है. हमेशा से है. चुनाव तो बस एक बहाना है. इस तसवीर को ट्वीट करने के लिए हम कांग्रेस पार्टी के आभारी हैं.)

 

डियर राहुल गांधी

आशा है, आप कुशल होंगे. और उन बधाइयों को बटोरने में जुटे होंगे, जो हर तरफ से आपके ऊपर बरस रहे हैं. हालांकि आपकी माता जी ने आपके आरोहन से ठीक पहले अपने संन्यास की घोषणा करके चर्चाओं का मुंह अपनी तरफ मोड़ लिया है. फिर भी आपको मिलने वाली बधाइयों में कमी नहीं है, क्योंकि आप आज मोदी विरोधी जमात की उम्मीद की इकलौती किरण है. वक्त आपका है. सामने न नीतीश हैं, न केजरीवाल. गुजरात में आपका पीआर प्रबंधन भी कारगर रहा. आपके इस बार सफलतापूर्वक लोगों को बता दिया कि आप अब गंभीर हो गये हैं, और कुछ नहीं तो अपने पार्टी का अध्यक्ष बनने के काबिल तो हो ही गये हैं. मगर बधाई देने वाले उन लोगों की कतार में मैं नहीं हूं. मुझे आपका यह चुनाव जमा नहीं.

इसलिए नहीं कि आप राजीव गांधी के बेटे, इंदिरा के पोते या जवाहर के वंशज हैं. इसलिए भी नहीं कि आपके चाटुकारों ने तमाम 90 के करीब नामांकन आपके पक्ष में किया. पूरे देश से. इसके अलावा कोई और उम्मीदवार नहीं था. आप निर्विरोध विजयी हुए. हालांकि यह तरीका अच्छा था, उम्मीद है लालू जी भी जब अगली दफा राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे या अपने बेटे को बनायेंगे तो यही फार्मूला अपनायेंगे, क्योंकि लालू ही आपकी पार्टी के असली फोलोवर हैं. वे मानते हैं कि पार्टियां घर की होती हैं, उन्हें घर के दायरे से बाहर नहीं जाने देना चाहिए.

मैं दुःखी इस बात से हूं कि आपने पार्टी अध्यक्ष की घरेलू कुरसी पर बैठने में इतने साल लगाये. हमें इंतजार करवाया. और जाहिर किया कि इस कुरसी का या देश के प्रधानमंत्री की कुरसी का आपके लिए कोई बहुत अधिक मोल नहीं है. कुरसियां आपके लिए इंतजार कर सकती हैं और आपके आने के बाद खुद-बखुद खाली हो सकती हैं. दुःखी इस बात से हूं कि एक वक्त आपने पार्टी के सांगठनिक ढांचे को दुरुस्त करने की कवायद शुरू की थी, तब लगा था कि आप कांग्रेस पार्टी में इंटरनल डेमोक्रेसी लाने जा रहे हैं. आपने नये-नये लोगों को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया था.

मैं दुःखी इसलिए हूं कि आपकी पार्टी में सचिन पायलट, जयराम रमेश, शशि थरूर, पी. चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे युवा और तेजतर्रार नेता हैं, जो आपसे तकरीबन हर मामले में बेहतर हैं. मगर आपकी पार्टी ही नहीं, ये तमाम लोग भी मानते हैं कि अध्यक्ष आपको ही बनना चाहिए. क्योंकि कांग्रेस आपके घर की पार्टी है. यह पार्टी जब आपके आंगन से निकलती है तो लड़खड़ाने लगती है.

इसे अगर वंशवाद या परिवारवाद कहूं तो यह कम होगा और झट से कई उदाहरण पेश कर दिये जायेंगे कि दूसरी पार्टियों में भी वंशवाद और परिवारवाद है. यह जो वाद है वह अलग किस्म का वाद है. इसका कोई विरोध नहीं है. पार्टी में सभी सहमत हैं कि सोनिया जी के बाद राहुल जी को ही कुरसी संभालना चाहिए. जो असहमत हैं, वे यह कहते हैं कि प्रियंका जी बेहतर होतीं. यह जो कांग्रेस पार्टी की लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति असहमति है, यह उसकी पतन का सबसे बड़ा कारण है. क्योंकि पूरी पार्टी आपके परिवार के हर काम के प्रति सहमत है. इसे आप ही दूर कर सकते थे, क्योंकि आपके आंगन से बाहर का कोई आदमी अगर बोलेगा तो बागी मान लिया जायेगा.

मगर आपने नहीं किया. क्योंकि आपमें उतना धैर्य, उतनी हिम्मत नहीं थी. सो आपने अध्यक्ष की कुरसी थाम ली. बगैर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान किये. हालांकि आप अगर चुनाव भी करवा देते और कुछ लोगों को खड़ा भी करवा देते तो क्या होता. जो भी जीतता वह मनमोहन सिंह होता. पद संभालने न संभालने से कुछ नहीं बदलता. आज से पहले भी कांग्रेस आपकी ही थी, आज भी आपकी ही है, आप राजनीति छोड़ भी दें तो एक रोज सभी कांग्रेसी नतमस्तक होकर आपके आंगन में पहुंच जायेंगे, कि चलिए आपके बगैर काम नहीं चल रहा. जैसा इन्होंने आपकी मां के साथ किया था.
शुक्रिया

एक अदना सा पत्रकार जिसे आप कभी इंटरव्यू नहीं देंगे

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