ट्रेन जैसी बोगियों में रहते बच्चे और असुरक्षित नौकरी के बीच पिसते शिक्षक, यही है बिहार के ‘नेतरहाट’ की कहानी

पुष्यमित्र

जमुई गया तो सिमुलतला आवासीय विद्यालय को देखने के मोह से खुद को बचा नहीं सका. इन दिनों जब बिहार में मैट्रिक और इंटरमीडियेटड के रिजल्ट आते हैं तो टॉप टेन में ज्यादातर यहीं के बच्चे होते हैं. मैं देखना चाहता था कि आखिर वह कैसा विद्यालय है, जहां एक साथ इतने मेधावी बच्चे पढ़ते हैं. जमुई स्टेशन पर साढ़े तीन घंटे के इंतजार और ईएमयू ट्रेन पर सवार होकर करीब डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद जब उस स्कूल तक पहुंचा तो पहली बात यही मन में आयी कि बिहार अफसरशाही इस विद्यालय को भी अपना शिकार बनाने से नहीं चूकी है. किसी वीराने में कुछ खंडहर हवेलियों और स्टील के बने कुछ ढांचों के बीच सात सौ बच्चे कुछ इस तरह रहते हैं कि सत्ते पे सत्ता फिल्म का सात भाइयों को अस्तबलनुमा घर याद आ जाये. वहीं दो दर्जन शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी इन्हें पढ़ाते हैं, खिलाते-पिलाते हैं और इनकी देख भाल करते हैं. देख कर बिल्कुल यकीन नहीं होता है कि यह वही विद्यालय है जिसे बिहार की सुशासन सरकार ने सुप्रसिद्ध नेतरहाट विद्यालय का विकल्प बनाने का सपना देखा था.

रेलवे की बोगीनुमा स्टील के घरों में रहते हैं छात्र

बिहार के इस नंबर वन स्कूल के हॉस्टल को देखकर आपको सहज ही रेल की बोगियां याद आ जायेंगी. ये स्टील के ढांचे की बनी हैं और इनके एक हॉल में रेल बोगियों की तरह 72 बच्चे रहते हैं. बेड भी रेल की स्लीपर बोगियों की तरह डबल डेकर हैं. इन्हें सामान रखने के लिए जो छोटा सा सेफ मिला है वह दस किताबों में भर जाता है. मेस का भी वही हाल है. इतनी जगह नहीं है कि सभी बच्चे एक साथ खाना खा सकें. स्कूल की कक्षाएं भी ऐसी ही स्टील की बोगियों में चलती हैं.

खंडहर हवेलियों में चलता है दफ्तर     

तकरीबन डेढ़ सौ साल पुरानी कोठियों में स्कूल का दफ्तर संचालित होता है. स्कूल प्रबंधन ने ये कोठियां किराये पर ले रखी हैं. इन कोठियों की हालत बहुत खस्ता है. स्थापना के नौ साल बीत जाने के बाद भी स्कूल को अपना परिसर नहीं मिला है. प्राचार्य बताते हैं कि पिछले दिनों चौबीस एकड़ जमीन परिसर के लिए एक्वायर की गयी है. दिलचस्प है कि विद्यालय की स्थापना के वक्त योजना बनी थी कि इसका परिसर 156 एकड़ में फैला होगा. अब यह योजना सिमट कर 24 एकड़ की हो गयी है. इसके बावजूद इसका भवन कब बनेगा यह तय नहीं है. इन दिनों बिहार में लगातार विभिन्न संस्थानों के भवन तैयार हो रहे हैं, झट से बिड होता है और दो-तीन साल में आलीशान भवन खड़ा हो जाता है. बुद्धा स्मृति पार्क, सभ्यता द्वार, बिहार म्यूजिम और पुलिस मुख्यालय के भवन बनने में कभी पैसों की कमी आड़े नहीं आयी. अब साइंस सेंटर, वैशाली में बुद्ध स्मृति केंद्र, बस अड्डा और दूसरे कई भवन बन रहे हैं. मगर शिक्षा के इस बेहतरीन केंद्र के भवन में सरकार को नौ साल क्यों लग गये यह सोच का विषय है.

अनिश्चित भविष्य की वजह से पलायन कर रहे शिक्षक

उस विद्यालय के परिसर में तकरीबन 36 घंटे का वक्त गुजारने के बाद यह समझ आया कि इसे बेहतरीन शिक्षक मिले हैं. विद्यालय के शिक्षक लगातार पढ़ाई लिखाई से संबंधित चिंताओं और बहसों में तल्लीन रहते हैं. हर शिक्षक अपने विषय के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करने में जुटा रहता है. जब मैं वहां था तो तीन दिवसीय संस्कृत वाचन समारोह की शुरुआत हुई थी, इस दौरान विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों को अधिक से अधिक संस्कृत में बातचीत करना था. यह भी मालूम हुआ कि अलग-अलग विषय के शिक्षक छात्रों को क्षेत्र भ्रमण के लिए ले जाते हैं. स्थानीय आदिवासियों के बीच छात्र फील्ड सर्वे किया करते हैं. हिंदी के तकरीबन सभी प्रमुख साहित्यकारों की जयंती मनायी जाती है. संभवतः यही वजह है कि यहां के छात्र इतने जहीन हैं और ऐसा रिजल्ट लाते हैं.

छात्रों के पीछे बना स्टील का ढांचा ही है इनका हॉस्टल

2015 में जब पहली बार यहां के बच्चों ने मैट्रिक परीक्षा दी तो बिहार टॉप टेन में यहां के 30 बच्चे शामिल थे. और टॉप 20 में सारे 120 बच्चे. 2016 में टॉप टेन में 42 बच्चे इसी स्कूल के थे, 2017 में रिजल्ट गड़बड़ाया और टॉप टेन में इस स्कूल के सिर्फ 10 बच्चे ही शामिल हो पाये. मगर 2018 में यहां के बच्चों ने रिजल्ट सुधार लिया. टॉप टेन में यहां के 15 बच्चे शामिल हुए, फर्स्ट, सेकेंड और थर्ड तो यहीं के बच्चे थे. इंटरमीडियेट में साइंस में सेकेंड टॉपर यहीं का छात्र था, आर्ट में टॉपर और थर्ड टॉपर यहीं के बच्चे थे.

मगर ऐसा परिणाम देने वाले शिक्षकों का खुद का भविष्य अनिश्चित है. नौ साल बीत जाने पर भी अभी तक उनसे नियत वेतन पर ही काम लिया जाता है. राज्य के नियोजित शिक्षकों ने जो वेतनमान लड़ कर हासिल किया है, इससे वे आज भी वंचित हैं. उनका पीएफ नहीं कटता, जबकि सरकारी नियम के मुताबिक दस से अधिक कर्मियों वाले संस्थान के कर्मियों का पीएफ नहीं कटना अपराध है. वेतन भी कम है. जबकि जिस नेतरहाट विद्यालय की तर्ज पर यह स्कूल बना था और यहां के छात्र जिस स्कूल की तरह का परिणाम दे रहे हैं, वहां के शिक्षकों को लेक्चरार के बराबर वेतन मिलता है. इस अनिश्चित भविष्य और मामूली वेतन की वजह से यहां से पांच शिक्षक नौकरी छोड़ कर जा चुके हैं. विज्ञान विषय के शिक्षक यहां आने के लिए तैयार नहीं होते. आज भी यहां केमिस्ट्री, बायोलॉजी, संस्कृत और कामर्स विषय के स्थायी शिक्षक नहीं हैं. एडहॉक और गेस्ट फेकल्टी से काम चलाया जा रहा है.

700 से अधिक छात्र वाले इस विद्यालय में कुल 16 स्थायी शिक्षक हैं. पांच स्थायी गैर शैक्षणिक कर्मी हैं. शेष कार्य दैनिक वेतनभोगियों और एडहॉक कर्मियों से चलाया जाता है. स्कूल में बच्चों के सेहत की देखभाल के लिए न डॉक्टर है और न ही नर्स. स्थानीय अस्पताल में काम करने वाली नर्स कभी-कभार यहां आ जाती है. छोटी-छोटी बीमारियां होने पर बच्चों को चालीस-पचास किमी दूर जमुई लेकर जाना पड़ता है. इस असुरक्षित परिसर में बच्चियों का क्या हाल होता होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

ऐसी परिस्थितियों की वजह से पिछले कुछ वर्षों में यहां नामांकन के लिए आवेदन आने कम हो गये थे. जब इस विद्यालय की स्थापना हुई थी तो छात्र-छात्राओं में इसे लेकर ठीक-ठाक क्रेज था और पहले साल यहां 120 सीटों (60 छात्र-60 छात्राएं) नामांकन के लिए 34 हजार आवेदन आये थे. मगर यहां की अव्यवस्था को देखते हुए यहां आवेदन लगातार घटने लगा. साल 2018 में तो निर्धारित तिथि तक महज 500 आवेदन ही आये. फिर आवेदन के लिए स्पेशल ड्राइव चलाया गया.

इन मेधावी बच्चों के साथ फोटो खिंचवाने से खुद को रोक नहीं पाया यह पत्रकार

जाहिर सी बात है कि सरकार ने जिस ऊंची सोच के साथ इस स्कूल की शुरुआत की थी, उसे बाद में राज्य की नौकरशाही ने इग्नोर करना शुरू कर दिया. इसकी स्थापना के लिए नेतरहाट ओल्ड ब्वायज एसोसियेशन के पूर्व छात्रों की एक कमेटी बनी थी. मगर समय के साथ उस कमिटी के छात्र अलग होते चले गये. महज कुछ वक्त के लिए अस्थायी परिसर में शुरू हुआ यह विद्यालय अब उस अस्थायी परिसर में ही स्थायी होने लगा है. उसी अस्थायी और असुरक्षित परिसर में अपनी असुरक्षित नौकरियों के साथ हर साल यहां के शिक्षक ग्रामीण प्रतिभाओं को निखारते हैं और ये बच्चे बेहतर रिजल्ट देकर राज्य की परीक्षा समिति की साख को बचाते हैं. मगर सरकार ने इनकी समस्याओं के प्रति आंखें मूंद ली हैं.

शिक्षण संस्थानों के प्रति यह उदासीनता बिहार की सरकारों के लिए और राजनीतिक दलों के लिए कोई मुद्दा नहीं है. विपक्ष कहता है कि नीतीश सरकार ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था का कबाड़ा कर दिया, मगर जब वही राजद नीतीश के साथ मिलकर सरकार चलाता है तो वह भी उसी तरीके से बर्ताव करता है. बिहार में बेहतरीन शिक्षण संस्थान कायम हो यह यहां की राजनीति का मुद्दा नहीं है और यह आदर्श विद्यालय इसका जीता-जागता उदाहरण है.

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