जीन्स-लेगिन्स पहनने वाली लड़कियां क्यों गड़बड़ मान ली जाती हैं?

क्या जींस और लेगिन्स पहनने वाली लड़कियां गड़बड़ होती हैं? क्या लिपिस्टिक और मस्कारा लगाने से लड़कियों के किसी खतरे में पड़ जाने की संभावना रहती है? पता नहीं आप क्या मानते हैं, मगर पटना के मगध महिला कॉलेज की नई प्रिंसिपल आज भी यही मानती हैं. इसलिए उन्होंने पद संभालने के साथ पहला फरमान यही जारी किया कि आज से कोई लड़की जींस, लेगिन्स या पटियाला पहन कर नहीं आयेगी. लिपिस्टिक और मस्कारा का इस्तेमाल नहीं करेगी.

दरअसल, प्रिंसिपल और वार्डेन का सख्त होना आज भी बिहार की महिला कॉलेजों की सबसे बड़ी खूबी मानी जाती है. इसी वजह से इन कॉलेजों की प्रिंसिपल पढ़ाई के बदले उन बातों पर तवज्जो देती हैं, जिससे लड़कियों की शुचिता, उनका कौमार्य बचा रहे. उनके कॉलेज में आने की वजह से यह सब विवाह से पहले नष्ट न हो जाये या विवाह के बाद लड़कियां किसी विवाहेतर संबंध के फेर में न पड़ जाये. मगर बदलते माहौल की वजह से लोग इन पुरातनपंथी विचारों से मुक्त हो रहे हैं. जबकि प्रिंसिपल महोदया आज भी लड़कियों को इन्हीं पुराने डंडे से हांकने की कोशिश कर रही हैं. इस मसले पर लेखक-पत्रकार अणुशक्ति सिंह ने एक विचारोत्तेजक टिप्पणी लिखी है कि क्यों जींस-लेगिन्स पहनने वाली लड़कियां गड़बड़ मान ली जाती हैं.

अणुशक्ति सिंह

कुछ दिनों पहले की बात है, तकरीबन सत्रह साल बाद एक भारतीय लड़की विश्व सुंदरी का ताज पहन कर देश लौटी थी. उसके ताज पहनने की ख़बर कई दिनों तक अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्ख़ियों में छाई रही. बीस साल की उस लड़की में न जाने कितनी लड़कियों को अपना अक्स दिख रहा होगा. लगभग उसी वक़्त या उससे थोडा पहले एक और खबर ने मुख्य ख़बरों में अपनी जगह बनायी थी. इस खबर का लेना देना भारतीय वायुसेना से था. हमारे इतिहास में पहली बार तीन लडकियाँ लड़ाकू हवाई जहाज़ उड़ाने जा रहीं थीं.

लेखक-पत्रकार अणुशक्ति सिंह

ये तमाम लडकियाँ उस आज़ादी का प्रतीक चिन्ह हैं जिसकी बात न जाने कब से होती आ रही है. समानता के हक के लिए एक आन्दोलन सरीखा छिड़ा हुआ है, लेकिन लगता है बराबरी के इस शोर में भी कुछ लोगों ने अपने कानों पर हाथ रख रखे हैं. उन्हें अब भी लड़कियों में इंसान से ज्यादा किसी की सम्पत्ति नज़र आती है. मुआमला पटना विश्वविद्यालय के सबसे नामी महाविद्यालयों में से एक मगध महिला महाविद्यालय का है. महाविद्यालय में हाल ही में नयी प्रिंसिपल का सत्तारोहण हुआ है. आते ही मुख्य प्राध्यापिका महोदया ने अपने तानाशाही फरमान की बौछार कर दी. पहली बात छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कुछ ऐसी चीज़ों पर बैन लगा दिया जिससे उन छात्राओं सहित समाज को भयंकर नुकसान होने की आशंका थी.
वे चीज़ें थीं, जीन्स, पटियाला सलवार, लेगिंग्स, लिपस्टिक, और मस्कारा. बिचारी जीन्स तो हमेशा से बेशर्मी की निशानी रही है, संस्कृति के रक्षकों ने महिला के खिलाफ हो रहे अपराधों के लिए इसे ही हमेशा से कसूरवार माना है. मेरे लिए शोध का विषय यह है कि पटियाला और लेगिंग्स पहनने से कैसे लडकियाँ अनुशासनहीन हो रहीं हैं?

जहाँ तक मेरी जानकारी का सवाल है, पटियाला भी एक प्रकार का सलवार है और लेगिंग्स चूड़ीदार पजामे का परिशोधित रूप है. भारतीय संस्कृत में स्त्री को सोलह श्रृंगार करने की सलाह दी गयी है जिसमें होठों और आँखों के रोजन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है. लिपस्टिक और मस्करा क्रमशः होठों और आँखों पर लगायी जाने वाले सौन्दर्य प्रसाधन हैं. खैर…

इन फ़रमानों पर गौर करते हुए ऐसा लग रहा है जैसे सम्बंधित महाविद्यालय में पढ़ रही लडकियाँ, लडकियाँ न होकर भेड़-बकरी हैं. जिन्हें हाँकने के लिए प्राचार्या कमर कस कर तैयार हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह वही काल है जब दिल्ली के विभिन्न महाविद्यालयों में लड़कियाँ छात्रावास में आने-जाने की समय-सीमा की पाबंदी पर सवाल उठाते हुए जोर शोर से पिंजरा तोड़ आन्दोलन चला रही हैं. चंडीगढ़ में हुए छेड़छाड़ मसले के बाद हक की लड़ाई के लिए तकरीबन बाईस शहरों में लड़कियाँ रात में सड़क पर निकल पड़ती हैं. बनारस में छेड़छाड़ के विरोध में हुआ आन्दोलन देशव्यापी ख़बर बन जाता है. उस वक़्त में एक पढ़ी-लिखी महिला जिन्हें संभवतः स्त्री अधिकार और एक भारतीय नागरिक के मूल अधिकारों की जानकारी अवश्य होंगी एक ऐसा आदेश ज़ारी करती हैं जिसकी वज़ह से लड़कियों का अस्तित्व फिर से शून्यता के कगार पर आकर खड़ा हो सकता है.

बात सिर्फ एक आदेश की नहीं है, उससे कहीं वृहत् है. यह पूरा आदेश लड़कियों के निजता और चुनाव के अधिकार पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. क्यों कोई लड़की अपने तरीके से सज-संवर नहीं सकती. क्यों उसके पहनने-ओढने पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है? क्यों अनुशासन के नाम पर उसकी आज़ादी को सीमाओं में बांध दिया जाता है. यह और कुछ नहीं पितृसत्ता का एक बेहद बुरा खेल है जिसका प्रतिनिधित्व करने वालों ने स्त्रियों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए उसके पहनावे पर हमला किया है. यहाँ यह खेल खेलने वाले भूल जाते हैं कि जिन अपराधों का वास्ता देकर ऐसे ऑर्डर्स पास किये जाते हैं, वे अपराध किसी स्त्री की ग़लती की वज़ह से नहीं होते हैं. उनका सीधा-सीधा सम्बन्ध एक विकृत मानसिकता से है, अन्यथा दूध-मुँही बच्चियाँ और हड्डी का ढाँचा बनी वृद्धाएँ हवस का शिकार नहीं बनायीं जातीं.

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