जिस स्कूल की गांधी ने स्थापना की उसे कुछ इस तरह जिंदा रखा भितिहरवा वालों ने

इतिहास गवाह है कि जिस-जिस प्रयोग से गांधी का नाम जुड़ा है, वहां आदर्श, इमानदारी और त्याग की भावना भी जुड़ती चली गयी. पश्चिमी चम्पारण के भितिहरवा में गांधी द्वारा खोले गये आश्रम और विद्यालय की भी कुछ ऐसी ही दास्तां हैं. गांधी की अपील पर एक स्थानीय मठ ने स्कूल के लिए जमीन दी. कस्तूरबा के नेतृत्व में वहां छह माह तक शिक्षा दान चला. फिर स्थानीय लोगों ने विद्यालय की कमान संभाल ली. एक जगह दिक्कत हुई तो दूसरी जगह और फिर तीसरी जगह जमीन दी गयी ताकि वह ऐतिहासिक विद्यालय जिंदा रहे. स्कूल ने भी बांस-बल्ली तक देने वाले दानकर्ताओं का हिसाब एक पतली सी कॉपी में रखा. आज जहां आश्रम एक बेहतरीन संग्रहालय में बदल गया है, गांधी द्वारा खोला गया स्कूल भी दूसरी जगह संचालित हो रहा है.
पचास साल पुरानी दानकर्ताओं की सूची.

बुनियादी विद्यालय, भितिहरवा के पास आज भी 1960 से लेकर अब तक के कई रिकार्ड हैं. किसने इस स्कूल के लिए जमीन दी, कब किस सेशन में कौन-कौन छात्र थे. कर्पूरी ठाकुर ने विधायक रहते हुए कैसे इस स्कूल के लिए सादे कागज पर एक हस्तलिखित लिखित पत्र सरकार को लिखा था. और इन कागजातों में सबसे अमूल्य वह पतली सी कॉपी है, जिसमें दर्ज है कि इस स्कूल के निर्माण के लिए कब-कब, किन-किन लोगों ने क्या-क्या सामान दिये. इस कॉपी में बांस, सुतली और छप्पर छाने के लिए इस्तेमाल होने वाले खर तक का हिसाब दर्ज है. 1961 के आसपास के इन तमाम कागजातों पर महामानव मोहनदास की छाप साफ-साफ नजर आती है, जिसे चंपारण ने महात्मा का नाम दिया.

इस स्कूल की स्थापना उस वक्त हुई थी, जब चंपारण का नील विरोधी आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था. तिनकठिया प्रथा खत्म होने का फैसला हो चुका था, बस लेजिस्लेटिव कौंसिल की मुहर लगने का काम रह गया था. उन दिनों गांधी ने सोचा कि पूरे चंपारण इलाके में स्कूलों की स्थापना की जाये और साफ-सफाई का काम कराया जाये. पिछले सात-आठ से इस इलाके में रह रहे गांधी जी का मानना था कि अशिक्षा, गंदगी और स्वास्थ्य इस इलाके की मुसीबतों की सबसे बड़ी जड़ है. वे चाहते थे कि यह क्षेत्र इन मुसीबतों से छुटकारा पा ले ताकि फिर कोई इनका शोषण न कर सके.
पहले तो उन्होंने नील प्लांटरों से ही अनुरोध किया कि वे अपने पैसे से अपने इलाके में रैयतों के लिए स्कूल खोलें. मगर प्लांटर जो गांधी से खार खाये रहते थे, तैयार नहीं हुए. फिर गांधी ने चंपारण के उन इलाकों में तीन स्कूल खोले जो प्लांटरों की जद से बाहर थे. पहला स्कूल बड़हरवा लखनसेन में खुला, दूसरा भितिहरवा और तीसरा मधुबन में. भितिहरवा स्कूल का महत्व इसलिए भी अधिक था, क्योंकि यहां कस्तूरबा खुद रह कर बच्चों को पढ़ाती थीं और डॉ देव साफ-सफाई का पैगाम फैलाते थे.
पहले ऐसा था विद्यालय भवन. तसवीर तेंदुल्कर की पुस्तक गांधी इन चंपारण से साभार

एक स्थानीय मंदिर के पुजारी बाबा रामनारायण दास ने गांधी जी को स्कूल खोलने के लिए 7.5 कट्ठा जमीन दी. और उस जमीन में स्थानीय लोगों की मदद से आनन-फानन में एक फूस की झोपड़ी खड़ी हो गयी. महात्मा गांधी का यह काम पड़ोस के बेलवा कोठी के मैनेजर एसी एमन को नहीं सुहाया. उन्होंने उस झोपड़ी में आग लगवा दी. मगर इस स्कूल की शुरुआत करने गांधी जी के साथ पहुंचे स्वयंसेवक सोमण जी ने तय किया कि गोरे तो फूस की झोपड़ी में ही आग लगाते हैं न… हम पक्का मकान खड़ा कर लेंगे. फिर स्थानीय लोगों की मदद से ईंट-गारा का इंतजाम किया गया और एक खपरैल पक्का मकान तैयार कर लिया गया. उसी भवन में सोमण जी और कस्तूरबा ने मिल कर स्कूल का संचालन शुरू किया. ये कहानियां बापू की आत्मकथा में दर्ज है.

आज भी उस खपरैल को संग्राहलय परिसर में भव्य तरीके से संरक्षित किया गया है और उसमें स्कूल की घंटी और कस्तूरबा की चक्की को भी सुरक्षित रखा गया है.
जब जगह कम पड़ने लगी तो वहां खुला स्कूल 1964 में एक नये परिसर में चला गया. कथा यह है कि देश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री जाकिर हुसैन 1959 में इस गांव में आये थे और उन्होंने स्कूल की जो दशा देखी. इससे उन्हें दुख हुआ और उन्होंने सरकार को प्रस्ताव भेजा कि इस स्कूल का बेहतर तरीके संचालन हो. इसके लिए जितने जमीन की दरकार थी वह एक जगह मिल नहीं पा रही थी. ऐसे में भितिहरवा स्कूल के पहले छात्र मुकुटधारी चौहान समेत तीन-चार लोगों ने अपनी जमीन उस व्यक्ति के नाम कर दी, जिसकी एकमुश्त 5 एकड़ जमीन एक जगह थी. फिर उस पांच एकड़ जमीन पर नये सिरे से सीनियर बेसिक स्कूल की स्थापना हुई. तब से आज तक वह स्कूल उसी जमीन पर चल रहा है.
चंपारण में कस्तूरबा और गांधी
चंद्रशेखर बैठ गये थे धरने पर तब बना भितिहरवा संग्रहालय
भितिहरवा स्थित संग्रहालय के बनने की कथा बड़ी दिलचस्प है. 1988 का साल था. इस साल पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा शुरू की थी. यात्रा के दौरान वे इस गांव में पहुंचे थे. उन्होंने जब आश्रम और स्कूल को बदहाल स्थिति में पाया तो वे चादर बिछा कर वहीं बैठ गये. उन्होंने कहा, हम क्यों हर बात के लिए सरकार के भरोसे रहें. आप चंदा दीजिये. मैं गांधी के आश्रम का जीर्णोद्धार कराऊंगा. आनन-फानन में चंदे के रूप में बड़ी राशि का इंतजाम हो गया.
मगर इस बीच इस गतिविधि की सूचना राज्य सरकार को हो गयी और सरकार की ओर से ईंट-बालू गिरा कर एक हफ्ते में संग्रहालय को भव्य स्वरूप में तैयार कर दिया गया. जब संग्रहालय बन गया तो चंद्रशेखर ने जमा चंदे के पैसे से गांव में ही एक गांधी शोध संस्थान की स्थापना कर दी. वह शोध संस्थान भारत यात्रा ट्रस्ट के द्वारा संचालित किया जाता है. आज भी रोजाना कई लोग भितिहरवा आश्रम स्थित गांधी स्मारक संग्रहालय को देखने आते हैं. वे गांधी जी की घंटी और कस्तूरबा की चक्की देखते हैं.
 (प्रभात खबर से साभार)

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