जिन भोजपुरी गीतों को गांवों में अकेली रह गयी औरतों ने रचा

bandini
जतसारी की सांकेतिक तसवीर. फिल्म बंदिनी.

आज भोजपुरी गीतों का मतलब अश्लीलता रह गया है. भले ही भोजपुरी में तरह-तरह के सुंदर और दिल को छू लेने वाले गीत रचे गये हों, मगर जब एक आम भारतीय से भोजपुरी गीतों के बारे में पूछा जाता है तो उसकी जुबान पर ‘लॉलीपॉप लागेलू’ ही आता है. और यह कोई आज की कहानी नहीं है, इसके पीछे उतनी ही लंबी परंपरा है, जितनी भोजपुरी इलाकों में पलायन की परंपरा रही है. लगभग दो-तीन सौ साल से यहां के पुरुष देश-विदेश में जाकर मजदूरी करते रहे हैं. कुछ लोग मारिशस-सूरीनाम जाकर बस गये तो कुछ पार्ट टाइम चाकरी के लिए पुरानी राजधानी कलकत्ता जाया करते रहे हैं.

इसी पलायन की कसक ने भोजपुरी में एक तरफ पूरबी, चैता और निरगुन, तो दूसरी तरफ जतसारी और झूमर को जन्म दिया. मामला सिर्फ विरह का नहीं था. अतृप्त यौन इच्छाओं का भी था. इन्हीं अतृप्त यौन इच्छाओं की बदौलत परदेस में अकेले रहने वाले पुरुषों ने ऐसे गीतों की रचना शुरू की जो कामुकता की हदों तक पहुंचने लगी. हालांकि विरह में सिर्फ पुरुष ही नहीं जलते थे, औरतें भी जो गांवों में अकेली छूट जाती थीं, वे भी विरह और अतृप्त कामेच्छाओं का शिकार थीं. कुछ गीत अकेले पुरुषों ने रचे तो कुछ अकेली औरतों ने. पुरुषों के रचे गीत जहां कामुकता से अश्लीलता की सीमा तक पहुंचने और उसे पार करने लगे, औरतों के रचे कामुक गीतों में भी उनका दर्द ही उभर कर आता रहा. इसकी गवाही जतसारी और झूमर जैसे गीतों में मिलती है.

टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइेंसेज की पूर्व शोध छात्रा आशा सिंह ने इस बारीक मसले पर बड़ा गंभीर काम किया है. उन्होंने अपने शोध के जरिये इस सवाल को उठाया है कि क्यों महेंदर मिसिर और बुलाकी दास जैसे पुरुषों ने जो विरह गीत रचे उनमें अकेले पुरुषों का दर्द नहीं है. दर्द और विरह से तड़पती औरतें ही अपनी परेशानी को स्वर देती हैं? क्यों इन विरह और अतृप्त कामेच्छाओं में डूबी काल्पनिक औरतों की भूमिकाओं में पुरुष ही स्त्री का भेस धर कर उतरते रहे हैं. आखिर इसकी वजह क्या है?

इस अध्ययन के दौरान उन्होंने कई दिलचस्प नतीजे निकाले हैं. उनका शोध बताता है कि यह सच है कि महिलाओं की विरह व्यथा का वर्णन करने वाले ढेरों गीत पुरुषों ने लिखे हैं और वही गीत ज्यादा प्रचलित हैं. मगर लोक मानस में बसे ऐसे कई विरह गीत हैं, जिन्हें महिलाओं ने रचा है और उनकी अभिव्यक्ति बिल्कुल अलग तरह की है.

जहां पुरुषों द्वारा रचे गये पलायन आधारित लोकगीतों में गांवों में छूट गयी स्त्रियों की यौनइच्छाओं का वर्णन है, वहीं गांवों में जो गीत इन छूट गयी औरतों ने रचे हैं उनमें काफी विविधता है. उन गीतों में औरतें इस बात से भी चिंतित होती है कि उनके पुरुष बाहर रह कर किसी दूसरी औरत के चक्कर में पड़ जायेंगे. अकेली रह गयी औरतें इन गीतों में परिवार में लगातार घट रही अपनी सामाजिक स्थिति का भी उल्लेख करती है और उन तमाम उपायों को अपनाती हुई भी नजर आती हैं, जिससे उनके पुरुष न जायें या जल्द लौट आयें.

आशा सिंह अपने शोध के जरिये इस नतीजे पर पहुंची हैं कि बहुत मुमकिन है कि पुरुष गीतों में अपने दर्द का जिक्र इसलिए नहीं करते हों कि भोजपुरी समाज में मर्दों का रोना सम्मानजनक नहीं माना जाता. वे अपना दुख जाहिर करना नहीं चाहते. यह भी कहा जा सकता है कि पलायन करने वाले पुरुषों का जीवन गांवों में अकेली रह गयी औरतों के जीवन से थोड़ा बेहतर होता है. इसलिए भी ये गीत पुरुष भी रचें तो औरतों को ही सूत्रधार बनाते हैं.

वे अपने शोध में बताती हैं कि पूरबी, चैता, गोंड, कहरवा और निरगुन गीत पुरुषों द्वारा रचे गये हैं, जबकि महिलाओं ने घरों में जतसारी और झूमर गीतों को स्वर दिया है. इनमें से पूरबी गीत काफी लोकप्रिय हुए हैं, जिन्हें एक सवर्ण पुरुष महेंदर मिसिर ने बीसवीं सदी में रचा है. ये गीत काफी रस भरे होते हैं और इन्हें दर्शकों के सामने गाया जाता है. जबकि जतसारी और झूमर जैसे गीतों को महिलाएं सामूहिक रूप से खुद ही गाती हैं, पारंपरिक रूप से उनका कोई दर्शक नहीं या श्रोता नहीं होता.

पूरबी, चैता और निरगुन जैसे गीत जहां मंच और महफिलों की विधा हैं, वहीं जतसारी गीत महिलाएं जांता(चक्की) चलाते वक्त गाती रही हैं. दोपहर के वक्त जब वे खाली होती थीं तो चक्की भी चलाती थीं और दूर देश गये अपने पुरुषों को याद कर गीत भी गाती थीं. इन दौरान कई बेहतरीन गीतों की रचना हुई. जिन्हें आज भी भोजपुर इलाके की औरतें गाती हैं, मगर उन्हें मंचीय या अकादमिक स्वीकृति और सम्मान नहीं मिल पाया. जबकि कथ्य और संवेदना के स्तर पर ये अधिक विविध और समृद्ध हैं. उन्होंने अपने शोध में कई जतसारी गीतों का उल्लेख किया है. ऐसा ही एक गीत कुछ यूं है-

घोड़वा चड़ल एक चेलिक; काहे सुनरी नीर ढरी
केकर जोहेलू बाट; नयन दुनो नीर ढरी
तोहरे अइसन पाचर पियवा हो; परदेसे गयो
उनकेरे जोहिला बाट; नयन दुनो नीर ढरी
लेहु ना सुनरी डार भरि सोनवा, मोती भांग भरि
छोड़ी देहु अइसन बउराह; लगहु मोरी साथे हरी
आगी लगइबो तोरा डाल भरि सोना; मोती जरि जाहु
लवटिहें उहे बउराह, लुटइबों तोरी बरधी धनी

जिनकी इस पूरी रिपोर्ट में रुचि हो वे इसे यहां पढ़ सकते हैं.

Of_Women_by_Men_Understanding_the_First

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