जानिये कौन जाति राजनीतिक रूप से मजबूत है बिहार में?

अब जबकि बिहार में दोनों प्रमुख गठबंधनों के उम्मीदवारों की सूची जारी हो गयी है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की कौन सी जाति राजनीतिक रूप से मजबूत है. हालांकि लोकतंत्र का सिद्धांत इस बात की खिलाफत करता है कि मतदाताओं को जात और धर्म से परे हटकर मतदान करना चाहिए. मगर जमीनी हकीकत यह है कि आज देश में ज्यादातर मतदान इसी आधार पर हो रहे हैं. इस लोकसभा चुनाव में तो बिहार में जाति ही सबसे बड़ा मुद्दा है. राजनीतिक दल न सिर्फ टिकट का बंटवारा जाति के हिसाब से करते हैं, बल्कि उम्मीदवार के नाम के आगे उसकी जाति का विवरण भी कई बार सूची में नजर आ जाता है. जाहिर है यह सब संबंधित जाति के राजनीतिक महत्व के लिहाज से किया जाता है.

दरअसल आज की तारीख तक एनडीए और महागठबंधन के तकरीबन 75 उम्मीदवारों की घोषणा की गयी है. दिलचस्प है कि इसमें यादव उम्मीदवारों की संख्या 15 है. यही जाति इस बार भी राजनीतिक दलों की पहली पसंद है. राजद जिसे अमूमन यादवों और मुसलमानों की पार्टी माना जाता है, ने इस जाति नौ उम्मीदवारों को टिकट दिया है. कांग्रेस ने एक यादव को मैदान में उतारा है. एनडीए भी यादवों को टिकट देने में पीछे नहीं है. उसने पांच यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया है. यादव जाति इस प्रतिनिधित्व का हकदार भी है, क्योंकि बिहार में इनकी संख्या 14.4 फीसदी है. इस जाति को कुल बीस फीसदी टिकट मिले हैं.

मगर सबसे रोचक मामला 75 में से 11 टिकट पा लेने वाली राजपूत जाति का है. क्योंकि इस जाति की कुल आबादी बिहार में बमुश्किल 5.2 फीसदी है. दोनों गठबंधन ने यादवों को ठीक-ठाक महत्व दिया है. एनडीए ने इस प्रभुत्वशाली जाति के 7 उम्मीदवारों को टिकट दिया है तो महागठबंधन चार राजपूत उम्मीदवार खड़े करने जा रही है. जबकि संख्या में इनसे अधिक 5.7 फीसदी आबादी वाले ब्राह्मणों को सिर्फ तीन टिकट मिले हैं. दो एनडीए ने दिया है, एक कांग्रेस देने जा रही है, कीर्ति आजाद को. जबकि महज 1.5 फीसदी आबादी वाले कायस्थों को दो टिकट दोनों गठबंधन देने जा रही है.

लगभग इतनी ही आबादी वाली दूसरी प्रभुत्वशाली जाति भूमिहार को अमूमन बिहार की राजनीति में ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व मिलता रहा है. मगर इस चुनाव में दोनों धड़ों ने इन्हें हाशिये पर धकेल दिया है और सिर्फ पांच टिकट दिये हैं. तीन एनडीए ने और दो महागठबंधन ने.

राज्य में सबसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी राजद का आधार वोट यादव और मुसलमान माने जाते हैं. इनमें यादव 14.4 फीसदी हैं और मुसलमान 16.9 फीसदी. मगर टिकट देने में यादव ने मुसलमानों से कम भेदभाव नहीं किया है. जहां उसने यादवों को नौ टिकट दिये हैं, उसे सिर्फ चार मुसलमान उम्मीदवार मिले हैं. महागठबंधन ने कुल छह मुसलिम उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है. जबकि एनडीए जो कथित रूप से मुसलिम विरोधी मानी जाती है, ने एक मुसलिम उम्मीदवार को टिकट दिया है. वह भी मुसलिम बहुल किशनगंज से.

इस लिहाज से देखें तो इस बार अति पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को 11 टिकट मिले हैं. सात एनडीए से और चार महागठबंधन से. ये डिजर्व भी करते हैं, क्योंकि राज्य में इनकी आबादी 26 फीसदी है. इस लिहाज से देखा जाये तो इन्हें कम ही टिकट मिला है. 6.4 फीसदी आबादी वाली कुशवाहा जाति को इस बार छह टिकट मिले हैं. खुद को इस जाति का प्रतिनिधि मानने वाली रालोसपा ने इन्हें अपने कोटे की पांच सीटों में से तीन टिकट दिया है. जबकि एनडीए की तरफ से तीन कुशवाहा उम्मीदवारों को उतारा जा रहा है.

सबसे दिलचस्प मामला आधी आबादी का है. महिलाओं को इस चुनाव में नौ सीटें मिली हैं. यानी दस फीसदी से थोड़ा अधिक. दिलचस्प है कि खुद को प्रगतिशील बताने वाली एनडीए की सूची में सिर्फ तीन महिलाएं हैं, जबकि महागठबंधन छह महिलाओं को मौका दे रही है. हालांकि इनमें से ज्यादातर महिलाएं किसी न किसी दबंग की पत्नियां हैं.

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