जब पूर्णिया की गुड़िया ने संसद भवन में किशोरियों के लिए आवाज उठायी

बासु मित्र

किशोरियों का मसला बिल्कुल अलग है. वे न बच्ची होती हैं, जिन्हें बहुत अधिक संरक्षण की जरूरत होती हैं. न ही वे युवा होती हैं, जिन्हें सबकुछ करने का संवैधानिक अधिकार मिला होता है. मगर नीतिगत कमियों की वजह से वे इन दोनों पाटों के बीच पिसती रहती हैं. मगर इस साल वैश्विक बाल दिवस(20 नवंबर) का दिन भारत भर की किशोरियों के लिए खास रहा. क्योंकि इस मौके पर संसद में जिन आठ बच्चों को सांसदों को संबोधित करने का मौका मिला, उनमें पूर्णिया की किशोरी गुड़िया भी थी, जिसने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाया और देश के कानून निर्माताओं के सामने बेबाकी से अपनी बात रखी.

उसने कहा, सरकार बच्चों के विकास और बेहतरी के लिए कई योजनायें चल रही है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है किशोरी युवतियों के स्वास्थ्य की देखभाल. अगर लड़कियां स्वस्थ्य ही नहीं होंगी तो आगे की पढ़ाई कैसे कर पाएंगी. ज्यादातर लड़कियों की कम उम्र में सिर्फ इस लिए शादी हो जाती है, क्यूंकि हाई स्कूल और कॉलेज उनके घर से दूर होता है. समाज सुरक्षा और देखभाल के नाम पर लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने देता है.

सांसदों की कमिटी के सामने अपनी बात रखते हुए कसबा प्रखंड की कुल्लाखास पंचायत के बसंतपुर गांव की रहने वाली गुड़िया ने कहा की मुझे आज आप सबों के सामने अपनी बात ख़ासकर किशोरी युवतियों की समस्या को सामने रखते हुए प्रसन्नता महसूस हो रही है, लेकिन उससे भी ज्यादा ख़ुशी तब मिलेगी जब इन हम किशोरियों की समस्याओं के समाधान के लिए उपाय तलाश कर इसे दूर किया जाएगा.

ग्रामीण किशोरियों को नहीं मिल पा रहा सरकारी योजनाओं का लाभ

संसद भवन से वापस लौटने के बाद गुड़िया बताती हैं कि यूनिसेफ के द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट स्वाभिमान से जुड़ने के बाद काफी कुछ सीखने को मिला. वहां संसद सदस्यों के सामने मैंने बिहार ख़ास कर अपने इलाकों की समस्या पर अपनी बात रखते हुए उन्हें बताया कि भले ही सरकार किशोरी युवतियों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर योजना चलाई जा रही है लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी इन योजनाओं का लाभ हम किशोरियों को नहीं मिल पाता है. स्वाभिमान प्रोजेक्ट के जिला समन्वयक नौशाद अली बताते हैं कि हम लोगों को गुड़िया पर पूरा विश्वास था कि वह किशोरी युवतियों की समस्या बेहतर तरीके से रह सकती है.

बिहार की इकलौती लड़की जिसे मिला यह मौका

गुड़िया बिहार की इकलौती लड़की है जिसे यह मौका मिला, इस कार्यक्रम में पूरे देश से मात्र 8 बच्चों का चयन किया गया था. वह यादव कॉलेज अररिया की इंटर फर्स्ट ईयर में पढ़ती है. गुड़िया के पिता प्रमोद कुमार विश्वास पेशे से किसान हैं. प्रमोद कुमार विश्वास भी गुड़िया के साथ दिल्ली गए हुए थे. वे बताते हैं कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरी बेटी इतनी अच्छी तरह से संसद भवन में लड़कियों की समस्या को लेकर अपनी बात रख सकेगी. लेकिन जब उसने बोलना शुरू किया तो हॉल के अंदर बैठे सभी लोगों की उत्सुकता जाग उठी. उसके भाषण के खत्म होने के बाद पूरा हॉल तालियों की आवाज से गूँज उठा. आज पूरे गांव को गुड़िया की उपलब्धि पर गर्व है.

 

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