चोरों के रहमोकरम पर है खंडहर में बदलती कोसी परियोजना की कर्मशाला

कोसी परियोजना के मुख्यालय होने की वजह से सुपौल जिले के बीरपुर कस्बे आज भी अलग तरह की रौनक दिखती है. यह रौनक उन दिनों अद्भुत हुआ करती थी, जब यहां भीमनगर बराज और कोसी तटबंध का निर्माण हुआ करता था. उस वक्त का जिक्र रेणुजी ने अपने उपन्यास परती परिकथा में किया है. हालांकि बड़ी उम्मीद से बनी बराज, बांध और नहरें हमारे क्षेत्र को कितनी समृद्धि दे पायी यह कहना मुश्किल है, मगर उस सुनहले दौर की यादें आसपास के निवासियों के मन में आज भी है. उन्हीं बातों को इस आलेख के जरिये याद कर रहे हैं, प्रत्युष सौरभ ‘राजा’

प्रत्युष सौरभ ‘राजा’

बिहार के सुपौल जिले में स्थित कोसी परियोजना का मुख्यालय, बीरपुर में स्थापित लगभग तीन एकड़ क्षेत्रफल में फैला केन्द्रीय कर्मशाला आज खंडहर में तब्दील हो गया है. इसके अंतर्गत बिहार सरकार से जुड़े समस्त छोटे-बड़े वाहनों, भारी मशीनों से लेकर कोसी नदी परियोजना के अपने दोनों हवाई जहाजों व रेल गाड़ी तक की मरम्मत व रख-रखाव इसके कामगारों द्वारा की जाती थी. इसके साथ ही सामानों की ढुलाई को लेकर बथनाहा से भीमनगर एंव भीमनगर से चतरा तक अपनी रेल लाइन व रेल गाड़ी भी थी. जो आज खंडहर से बदतर स्तिथि में है. इसी केन्द्रीय कर्मशाला में परियोजना मुख्यालय वीरपुर समेत भीमनगर एंव कोसी बराज तक के लिए बिजली उत्पादन हेतु एक बिजली पावर हाउस भी है. जिसका अब नाम मात्र औचित्य रह गया है.

उस वक्त कोसी योजना मुख्यालय के यांत्रिक प्रमंडल के जिम्मे केन्द्रीय कर्मशाला में लगभग दो हजार कुशल कारीगर व कुशल मेकेनिक और टेकनिशीयन पूर्व में कार्यरत थे, जिन्हें बिहार समेत अन्य प्रदेशों से चुन-चुन कर यहाँ लाया गया था. स्थापना काल से लेकर 1980-85 तक सभी तरह के मेकेनिकल कार्य यहाँ होते थे. उसके बाद विभागीय उपेक्षा के कारण यह बंद कर दिया गया और कुशल कारीगर बैठे-बैठे वेतन लेते रहे और सेवानिवृत होते गए.

कोसी परियोजना के स्थापना काल में कोसी बराज के निर्माण को लेकर विदेशों से आयात किए गए भारी एवं हल्की मशीनें आज भी विभागीय उपेक्षा का दंश झेल रहें हैं. एक ओर जहाँ उसके अवयवों की चोरी हो रही है वहीं कुछ कार्य कर रही भारी मशीनें भी देख-रेख के अभाव में बर्बाद हो रही हैं. इन मशीनों को चोरों की नजर लग गई और चोरों नें इसके बहुमुल्य समानों को निकाल कर इन्हें खोखला बनाना शुरू कर दिया है.

कोसी बराज निर्माण काल में आई थीं मशीनें 

कोसी बराज के निर्माण काल में अरबों की लागत से बिहार सरकार द्वारा कई भारी एवं हल्की मशीनें विदेशों से आयात की गई थी. ये एक दशक पहले तक काम करती थीं. इन्हीं मशीनों द्वारा कोसी बराज का निर्माण किया गया था. ये मशीनें बेवजह पड़ी हुई हैं.

वीरपुर-भीमनगर में थी कर्मशालाः
इन मशीनों की रख रखाव व मरम्मत के लिए वीरपुर व भीमनगर में कर्मशाला की स्थापना की गई थी. मगर 1990 के दशक के बाद इसे उपेक्षित रखा जाने लगा और कोसी की धरोहर कोसी रेल के सभी अवयवों के साथ कुछ भारी मशीनों को विभाग द्वारा औने-पौने दाम में नीलाम कर दिया गया. उस वक्त कुछ मशीनें चालू हालात में भी थी. 90 के दशक में इन दोनों जगहों के सभी उपकरणों को यांत्रिक प्रमंडल वीरपुर के जिम्मे दे दिया गया. उस समय से लेकर आज तक इन मशीनों के सामानों की चोरी बदस्तुर जारी है. इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि परियोजना के निर्माण के लिए सुई से लेकर बड़े से बड़े संयंत्र तक यहाँ मरम्मत किया जाता था. अभी यहां सौ से भी कम कर्मी कार्यरत हैं.

मुँह चिढ़ा रही मशीनें 
भीमनगर में भी एफएमएस नामक कर्मशाला थी. इसके कुछ भाग को एसएसबी, भारत सरकार को दिए जाने के उपरांत आज भी यहाँ भारी एंव हल्की मशीनों का विशाल जखीरा सड़ रहा है. एक तरफ सरकार उद्योग लगाने का प्रयास कर रही है वहीं यह लगा-लगाया विशालकाय उद्योग विभागीय उदासीनता के कारण खंडहर बन गया है.

सुरक्षा को लेकर ठोस इंतजाम नही
कुसहा त्रासदी 2008 के कुछ वर्ष बाद तक चल रहे विशालकाय क्रेन को भी लगभग 5 वर्षों से विभाग ने सड़ने गलने के लिए खुले आसमान के नीचे छोड़ रखा है. दोनों कर्मशाला में कहने को तो होमगार्ड जवान सुरक्षा के लिए तैनात हैं लेकिन फिर भी लगातार चोरी होने की बात उजागर होती रहती है. 90 के दशक में यहाँ के कुछ मशीनों को विभाग द्वारा अजय बराज के निर्माण के लिए देवघर भेजा गया था.

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