गेट्स फाउंडेशन समाजसेवी या बच्चियों को गिनी पिग बनाने वाला?

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पटना के जमसौत गांव में बिल गेट्स अपनी पत्नी मेलिंडा के साथ.

सूचना क्रांति के इस महान युग में कैसे बड़ी-बड़ी सूचनाएं दब जाती हैं, यह खबर इसी का उदाहरण है. फरवरी, 2017 में केंद्र सरकार ने गेट्स फाउंडेशन के लिए नेशनल हेल्थ मिशन के दरवाजे बंद कर दिये और मेरे जैसे सजग पत्रकार को यह खबर दस महीने बाद नवंबर में पता चला, जब एक मित्र ने न्यूजीलैंड के एक ऑनलाइन पोर्टल का लिंक शेयर किया. हालांकि मुझे पता था कि यह फाउंडेशन देश में गड़बड़ी कर रहा है, ड्रग टेस्टिंग जैसा काम कर रहा है. मगर मैं इस मामले में बहुत कंफर्म नहीं था. आज सर्च कर रहा हूं तो देखता हूं कि रायटर ने यह खबर जारी की थी. ईटी ने भी प्रकाशित किया था. इसके अलावा मेन स्ट्रीम मीडिया में यह खबर कहीं नहीं मिलती.

main-qimg-3c27e2a480e32c2397bd19ca8f48c59dखबर यह है कि मानवसेवा की आड़ में गेट्स फाउंडेशन ने 2009-10 में आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में और गुजरात के वड़ोदरा में 30 हजार से अधिक आदिवासी किशोरियों पर सर्वाइकल कैंसर के ड्रग की टेस्टिंग की. ड्रग टेस्टिंग के बाद ज्यादातर किशोरियों की हालत बिगड़ने लगी. इनमें से सात की तो मौत हो गयी. इसके बाद आनन-फानन में इस ड्रग टेस्टिंग को रोका गया. स्वयंसेवी संस्थाओं ने आवाज उठायी, सरकारी जांच हुई और आखिरकार इस साल इस समाजसेवी फाउंडेशन को बाय-बाय कह दिया गया. इस मामले की जांच 2010 में संसद की स्वास्थ्य मामलों की समिति ने की है और उसने पाया है कि इस पूरे कारोबार में भीषण किस्म की गड़बड़ी हुई. न कंसेंट फार्म ठीक से साइन कराये गये, न उन लोगों को ठीक से बताया गया जिन पर यह टेस्ट हो रहे थे. दुःखद तो यह है कि कैंसर की दवा तलाशने की कोशिश में भारत की गरीब आदिवासी किशोरियों को गिनी पिग बना दिया.

एक और इंटरनेशनल न्यूज पोर्टल नेचुरल न्यूज के मुताबिक आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में और गुजरात के वडोदरा जिले में कई इलाकों में गेट्स फाउंडेशन कम्युनिटी डेवलपमेंट के प्रोजेक्ट चलाता था. इन दोनों जगहों में इसने अनपढ़ आदिवासी युवतियों को यह ड्रग एचवीपी(ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीन के साथ यह कह कर दिया कि यह उनकी सेहत के लिए फायदेमंद है. 9-15 वर्ष के आयुवर्ग की 16 हजार किशोरियां खम्मम की थीं और 14 हजार वड़ोदरा की. खम्मम में मर्क कंपनी के एचवीपी वैक्सीन का ट्रायल किया गया और वड़ोदरा में ग्लैक्सो स्मिथकिलन की सर्वेरिक्स नाम एचवीपी वैक्सीन की खुराक दी गयी. दिलचस्प तथ्य यह है कि इस ड्रग टेस्टिंग के कारोबार में आइसीएमआर( इंडियन काउंसिल और मेडिकल रिसर्च) की भी भागीदारी बतायी जाती है.

बाद में जांच के दौरान यह भी पता चला कि आइसीएमआर ने इस ड्रग टेस्टिंग के लिए न तो ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से इजाजत ली थी और न ही इंडियन नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्युनाइजेशन से. यह खुद-बखुद इन संस्थाओं के साथ प्राइवेट दवा विक्रेताओं द्वारा विकसित ड्रग टेस्टिंग में शामिल हो गया, यह उद्देश्य बताते हुए कि वह देश की महिलाओं के लिए एचवीपी वैक्सीन की संभावनाएं तलाश रहा है. जांच में यह भी पता चला कि जिन किशोरियों को यह खतरनाक वैक्सीन दिया गया, उनके बिगड़ते स्वास्थ्य की बिल्कुल निगरानी नहीं की गयी.

आंध्र प्रदेश में जब स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्टों ने दौरा किया तो उन्हें सौ से अधिक ऐसी किशोरियां मिलीं, जिन पर ड्रग ट्रायल हुआ था और वे मिर्गी का शिकार हो गयी थीं, उन्हें भीषण माइग्रेन रहता था और मूड स्विंग की शिकायत करती थीं. कई किशोरियों को समय से पहले माहवारी शुरू हो गयी, कुछ ने बहुत अधिक रक्त स्राव की शिकायत की.

यह पूरा मामला हमें हर परोपकारी और मानवतावादी अभियान को संदेह की दृष्टि से देखने के लिए मजबूर करता है. बिल गेट्स बिहार आते रहे हैं. उन्होंने एक बार खगड़िया के फरकिया इलाके के गुलरिया गांव का दौरा किया था और उसे गोद लेने की बात की थी. पटना के पास भी वे एक मुशहर बस्ती में गये थे. शायद बांका के इलाके में भी दौरा किया था. उस वक्त सरकार ने उनका भरपूर स्वागत किया था. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन कई इलाकों में काम करता है. खगड़िया में भी इनका दफ्तर है. पल्स पोलियो अभियान में तो इनकी देशव्यापी मौजूदगी है.

billGatesVaccine31016इसके बावजूद ये हमारे गरीब इलाकों में क्या गुल खिलाते हैं, यह अब जाहिर हो चुका है. बहुत मुमकिन है कि पल्स पोलियो अभियान की विश्वसनीयता को बचाने के लिए सरकार की तरफ से इस खबर को अधिक प्रसारित नहीं किया गया हो. मगर क्या यह सरकार की जवाबदेही नहीं बनती कि ऐसे राष्ट्रव्यापी अभियानों में शामिल करने से पहले किसी संस्था की विश्वसनीयता जांची जाये. और क्यों ऐसे संस्थान को सरकारी अभियान में शामिल किया जाये? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सरकार ने गेट्स फाउंडेशन को इस अपराध की सजा क्या दी और आइसीएमआर के अधिकारियों के साथ क्या किया जो इस अभियान में बराबरी के साझेदार थे. दिलचस्प है कि यह फाउंडेशन आज भी देश के कई हिस्से में काम कर रहा है.

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