खेत में खड़ा है गन्ना और खरीदार कोई नहीं, बताइये क्या करे किसान?

यह एक ऐसा मसला है जिसे किसान हुए बगैर समझा नहीं जा सकता. बिहार के सीतामढ़ी, शिवहर, मुजफ्फरपुर और पूर्वी चंपारण जिलों के 35 हजार किसान इस साल अजीब किस्म की आपदा का सामना कर रहे हैं. उनके खेतों में तकरीबन 40 लाख क्विंटल गन्ना खड़ा है. यह उनकी साल भर की मेहनत का नतीजा है. मगर इस मेहनत को कीमत देने वाले एकमात्र चीनी मिल ने इस गन्ने को खरीदने का कार्यक्रम अनिश्चित काल के लिए टाल दिया है. खबर है कि सीतामढ़ी की रीगा चीनी मिल खुद बिकने के लिए तैयार है. खरीदार नहीं मिल रहा इसलिए इस साल इस चीनी मिल में गन्ना पेराई का सत्र ही शुरू नहीं हो रहा.

अब आप इन हालत में गन्ना किसानों का दुख समझ सकते हैं. अगर यह गन्ना बिकता तो तकरीबन 125 करोड़ की लागत का होता. इस तरह देखा जाये तो औसतन प्रति किसान 42 हजार रुपये का नुकसान है. रीगा चीनी मिल का पेराई सत्र आज की ही तारीख से शुरू होने वाला था. मगर मिल मालिक ने इसे अनिश्चित काल के लिए टाल दिया है. इस बीच रीगा बाजार और आस-पास के इलाकों में खबर तैरने लगी है कि यह चीनी मिल बंद होने वाला है, मतलब यह कि इस बार की गन्ना फसल को कोई खरीदार नहीं मिलने वाला. मिल बंद होने की खबरों के पीछे कई कारण हैं. एक तो मिल मालिक चार-पांच साल से लगातार घाटे में है और दूसरा किसानों का उस पर 16 करोड़ रुपये का बकाया है. इसके अलावा वर्कर्स यूनियन भी मिल पर लगातार कई तरह के दबाव बना रही है.

खबर है कि इन परिस्थिति में मिल मालिक ओपी धानुका कारोबार समेटने में जुट गये हैं. पारिवारिक परिस्थितियां भी उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रही है. वे चाहते हैं, या तो मिल को कोई खरीदार मिल जाये या कोई अच्छा पार्टनर. मगर इस कोशिश में वे अब तक सफल नहीं हो पाये हैं. दिलचस्प है कि जो धानुका महोदय आज चीनी मिल चलाने के अनिच्छुक हैं, वे कभी ऑल इंडिया सुगर मिल एसोसियसन के चेयरमैन रह चुके हैं. इस बीच सरकार पर भी उनका बकाया है, जिसे लेकर आज बिहार सरकार ने उनका गोदाम सील कर दिया है. बहरहाल उनकी इस हालत के बीच किसानों का दम फूल रहा है कि अगर पेराई नहीं हुई तो उनके गन्ने का क्या होगा?

सीतामढ़ी, पूर्वी और पश्चिमी चम्पारण, शिवहर, गोपालगंज और समस्तीपुर तक के ईख कास्तकारों को जोड़ते हुए बिहार राज्य ईख कास्तकार संघ का गठन किया गया था. इस संघ के महासचिव नागेन्द्र प्रसाद सिंह रीगा चीनी मिल से जुड़े 35 हजार ईख कास्तकारों के मसले को लेकर पिछले 3-4 दिनों से राज्य के गन्ना मंत्री, विभागीय प्रधान सचिव सहित इलाके के सभी प्रतिनिधियों का दरवाजा खटखटा चुके हैं. वे बताते हैं कि मंत्री ने तो काफी सकारात्मक बातें की पर विभागीय सचिव ने अजीबोगरीब सुझाव दे दिया है.

उनका सुझाव है कि मिल मालिक अगर मिल नहीं चलाता है तो गन्ना नरकटियागंज, बगहा या किसी दूसरी मिल को भेज दें, उसका भाड़ा सऱकार वहन करेगी. नागेंद्र सिंह कहते हैं, यह कागजी बातें हैं, इस प्रस्ताव पर अमल करना मुश्किल ही नहीं असंभव है. इन चीनी मिलों की दूरी कम से कम 100-150 किमी है. इतनी दूरी तक गन्ना के फसल को पहुंचा एक कपोल कल्पना ही है. और मान लीजिये कि सरकार की बातों पर भरोसा करके किसान अपनी जेब से भाड़ा लगाकर वहां गन्ना पहुंचा भी दे तो जो अब तक की परंपरा है सरकार से भाड़ा वसूलना किसानों के लिए भीषण परेशानी का सबब बन जायेगा. अभी तो ये किसान चीनी मिल से अपना 16 करोड़ का बकाया भी वसूल नहीं पाये हैं.

हिरोलवा के किसान गुनानन्द चौधरी कहते हैं कि हर हाल में रीगा मिल को चालू करना ही अन्तिम विकल्प है. मिल मालिक अगर असमर्थ है तो सरकार खुद बागडोर अपने हाथ लेकर मिल चलाये. संघ के पूर्व अध्यक्ष लखनदेव ठाकुर और ईख क्रय-विक्रय सहयोग समिति के सचिव रहे विरेन्द्र कुमार सिंह का कहना है कि किसानों का पिछले सीजन का बकाया 16 करोड़ रूपये का भुगतान करके रीगा मिल को चालू कराना चाहिए, अन्यथा मजबूरन किसान अपना गन्ना नेपाल की चीनी मिलों को देने पर विवश हो जायेगा जो उनके करीब है. पिछले सीजन में तकरीबन 3 लाख क्विंटल गन्ना नेपाल चला गया था, जो गैर कानूनी तो है ही राज्य को आर्थिक नुकसान भी पहुंचाता है. किसान प्रसिद्ध नारायण सिंह और रामबृक्ष महतो का कहना है कि इस इलाके के लिए गन्ना एक मात्र नगदी फसल है. इसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है और यह काम नरकटियागंज और बगहा मिल के भरोसे संभव नहीं है.

इस मसले को लेकर 30 नवम्बर को रीगा किसान भवन में किसान प्रतिनिधियों की एक बैठक होने वाली है, जिसमें आगे की रणनीति तय होगी. नागेंद्र सिंह कहते हैं, मुद्दा साफ है-या तो मिल मालिक खुद वित्तीय हालत सुधार कर, बैंकों से या सरकार से सहायता या कर्ज लेकर मिल को स्थायित्व प्रदान करे. अगर मिल मालिक अपना हाथ खींचता है तो किसानों की साझेदारी/ पार्टनरशिप खड़ी हो सकती है? सरकार खुद मिल चलाने के लिए किसी एजेन्सी को जबाबदेही दे सकती है? यह एक जीता जागता सवाल हो सकता है. नहीं तो कभी 29 चीनी मीलों वाले इस बिहार में नये चीनी मिल की स्थापना, बंद पड़े चीनी मिलों को पुर्नजीवत करने के दम तोड़ते प्रयास के बीच एक और ‘विकेट’ गिरने का दृष्य उभरने ही वाला है.

 

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