क्यों भागे-भागे फिर रहे हैं शहाबुद्दीन को तमीज सिखाने वाले अफसर सीके अनिल?

नौकरी चाहे सिविल सर्विसेज की ही क्यों न हो, अगर आप सत्ता से तालमेल नहीं बिठाते तो आपके लिए काम करना मुश्किल हो जाता है. हरियाणा के इमानदार अफसर खेमका की कहानी तो सर्वविदित है. बिहार के एक सीनियर आइएएस अफसर सीके अनिल की कथा तो और भी अजीब है. कभी डीएम के रूप में काम करते हुए माफिया डॉन शहाबुद्दीन को तमीज सिखाने वाले और सीवान जिले में कानून का राज स्थापित करने के लिए मशहूर सीके अनिल इन दिनों भागे-भागे फिर रहे हैं. किसी को नहीं मालूम वे कहां हैं. उन्हें पटना हाईकोर्ट ने भगोड़ा घोषित कर दिया है. इससे पहले भी 2013 में उन पर बिस्कोमान से कंप्यूटर और फाइलों चुराने के आरोप में नॉन बेलेबल वारंट जारी किया गया था.

एक सीनियर अफसर जो अपने बेहतरीन कामकाज की वजह से कभी जनता की निगाह में हीरो था, उसे इस स्थिति में देखना दुखद है. उन पर ताजा आरोप बीपीएससी द्वारा आयोजित क्लर्क लेवल परीक्षा के प्रश्न पत्र आउट कराने का है, इसी आरोप में एक आइएएस सुधीर कुमार गिरफ्तार किये जा चुके हैं. यह समझ से परे है कि एक ऐसा तेज तर्रार अफसर कंप्यूटर चुरा सकता हो और परीक्षा के प्रश्नपत्र आउट कर सकता हो. बहरहाल मामले की एसआइटी द्वारा जांच चल रही है.

अप्रैल 2017 में संभवतः आखिरी दफा सीके अनिल ने मीडिया के सामने इस मामले में अपना पक्ष रखा था. उन्होंने कहा था कि उन्हें फंसाने की कोशिश की जा रही है. वजह सिर्फ इतनी है कि सरकार तीन आइएएस अफसरों को नियम विरुद्ध प्रोमोशन देना चाह रही थी, उन्होंने इसकी शिकायत की और उन्हें प्रोमोशन नहीं मिल सका. वे अधिकारी सरकार के चहेते और मुख्यमंत्री के करीबी थी. अब ये लोग उन्हें फंसाने में जुटे हैं.

उन्होंने कहा था कि वे बीपीएससी पर्चा लीक कांड की जांच सीबीआई से करवाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने कई दफा पीएमओ में पत्र लिखकर मांग भी की है. एसआइटी की जांच ही दिशा ही ऐसी है कि उन लोगों ने तय कर लिया है, मुझे दोषी करार देंगे. निष्पक्ष जांच हो तो बात सामने आ सकती है. मूलतः खगड़िया के रहने वाले 1991 बैच के आइएएस अधिकारी सीके अनिल की नियुक्ति इस वक्त बिहार राज्य प्लानिंग बोर्ड के सलाहकार के पद पर है.

जहां तक फरार होने की बात है, उन्होंने कहा था कि उन्होंने रजिस्टर्ड डाक से तीन महीने के अवकाश का आवेदन भेज दिया था. मगर सरकार की तरफ से कहा गया कि उनकी छुट्टी स्वीकृत नहीं की गयी है और उन्हें एक हफ्ते के अंदर ज्वाइन करने का निर्देश दिया गया है.

हालांकि उस वक्त राज्य की राजनीतिक स्थिति अलग थी और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने तब बयान दिया था कि एक इमानदार अफसर को सरकार बेवजह परेशान कर रही है. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने भी सरकार पर एक दलित अधिकारी को परेशान करने का आरोप लगाया था. अब ये दोनों सरकार के साथ हैं, देखते हैं इस मामले में अब इनका पक्ष क्या होता है.

इन तथ्यों से जाहिर है कि सीके अनिल की सरकार के कुछ अफसरों के टकराव की स्थिति है. इसके बावजूद उनका इस तरह गायब हो जाना उनका ही पक्ष कमजोर कर रहा है. उन्हें डर है कि उन्हें गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया जायेगा और सुधीर कुमार की तरह उनका भी कैरियर खत्म कर दिया जायेगा.

पटना हाइकोर्ट ने अपने ताजा आदेश में साफ-साफ कहा है कि वे एक माह यानी 14 दिसंबर, 2017 के अंदर आकर कोर्ट में हाजिर हो जायें. वरना उनके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई की जायेगी. नोटिस खगड़िया स्थित उनके पैतृक पर भी भिजवाया गया है. अब देखना है कि सीके अनिल क्या फैसला करते हैं और इस टकराव का क्या अंजाम सामने आता है.

Spread the love

Related posts