क्यों नहीं करते आज के दिन विवाह, नहीं रखते आम्रपाली नाम?

प्रियदर्शन शर्मा  (लेखक पत्रकार हैं और मूलतः बिहार के मोकामा के रहने वाले हैं, फिलहाल बेंगलुरू में ठिकाना बनाये हुए हैं, उनके फेसबुक वाल से साभार)

आज विवाह पंचमी है… अर्थात् श्रीराम और जानकी (सीताजी) के विवाह का पावन दिन… लेकिन कुसंयोग देखिए जानकी के ‘मिथिला’ सहित देश के विभिन्न भागों में आज के दिन लोग विवाह नहीं करते हैं…. लोगों का सीधा सीधा मानना है कि जब आज के दिन विवाह होने से सीताजी को जीवनपर्यंन्त कष्टों का सामना करना पड़ा तो हम क्यों उस दिन विवाह जैसा शुभ विधान संपन्न करें…

यानी निज भजिए सीता-राम लेकिन नहीं चाहिए जीवन तेरे जैसा मुझकों सीता-राम’

हालांकि मैं ऐसे तीन लोगों से परिचित हूं जिनका विवाह ‘विवाह पंचमी’ के दिन हुआ और आज उनमें से एक नाती-पोते वाले जबकि दो बाल बच्चेदार बन चुके हैं… साथ ही हंसी-खुशी, आनंददायक जीवन बीत रहा है ….

ऐसा ही कुछ ‘आम्रपाली’ नाम के साथ भी जुड़ा है… बौद्ध काल में वैशाली गणतंत्र की राजनर्तकी (नगरवधू) का नाम आम्रपाली था… कहते हैं जो भी उसे एक बार देख लेता वह उस पर मुग्ध हो जाता था… आम्रपाली के कई किस्से हैं… कई दंतकथाएं हैं…

लेकिन सभी कथाओं के बीच एक सच्चाई यह भी है कि आज भी लोग अपनी बेटियों का नाम आम्रपाली नहीं रखते हैं… विशेषकर बिहार में तो आम्रपाली नाम की लड़की आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेगी…

हालांकि बिहार से दिल्ली-एनसीआर गये एक बिल्डर हैं ‘अनिल शर्मा’ जो ‘आम्रपाली’ नाम से ही अर्पाटमेंट बनाते हैं … जहां वैशाली गणतंत्र में आम्रपाली नगरवधू हुआ करती थी वहीं दिल्ली में मौजूद आधुनिक ‘वैशाली’ में आम्रपाली के कई अपार्टमेंट … होर्डिंग्स नजर आते हैं …. यानी हमारे ननिहाल वाले अनिल शर्मा के लिए आम्रपाली शुभाशुभ हो गई 🙂

खैर विवाह का सीजन शुरु हो गया है और आज ही किसी ने व्हाटसअप पर भेजा था …..
चलनी के चालल दुलहा, सूप के फटकारल हे,
दिअका के लागल बर, दुआरे बाजा बाजल हे।
अर्थात्, ऐसा दूल्हा जो जिसमें कोई दोष न हो, कोई अवगुन न हो …. और अगर कोई दोष रहा भी हो तो उसे विविध प्रकार की साफ सफाई की प्रक्रिया से दूर कर लिया गया हो …

‘भिखारी ठाकुर’ के इस गीत को बिहार में विवाह के अवसर पर भोजपुरी, मैथिली, मगही में अपने अपने अंदाज में गाए जाते हैं …
लोकगीतों की परंपरा धीरे धीरे समाप्त हो रही है … विवाह जैसे आयोजनों में भी लोग फिल्मी गीतों की धुनों पर थिड़कते हैं लेकिन लोकगीत एक ओल्ड कल्चर का प्रतीक बन गया है … दरअसल हम जिस संस्कृति की रक्षा की बात करते हैं उसमें लोक परंपराओं, रिति रिवाज, क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ने के साथ साथ लोकगीतों का संरक्षण और उन्हें युवा पीढी से जोड़ने के लिए प्रयास करना चाहिए … द्विअर्थी संवाद वाले फिल्मी गीतों से कहीं ज्यादा बेहतर हमारे लोकगीत हैं … जिसमें ‘महक मिट्टी की’ है …

तो विवाह पंचमी के इस पावन अवसर पर उम्मीद है सभी दूल्हे और उनकी दुल्हन दोेंनों ही ‘चलनी के चालल और सूप के फटकारल’ जीवन बिताते हुए मोहब्बत की मिशाल पेश करें … जैसे सीता-राम रहे ।

वैसे राम के लिए भी ऐसा गाया गया होगा-
आँवा के पाकल दुलहा, झाँवा के झारल हे;
कलछुल के दागल, बकलोलपुर के भागल हे।
सासु का अँखिया में अन्हवट बा छावल हे;
आइ की देखऽ बर के पान चभुलावल हेीीी।
आम लेखा पाकल दुलहा, गाँव के निकालल हे;
अइसन बकलोल बर चटक देवा का भावल हे।
मउरी लगावल दुलहा, जामा पहिरावल हे;
कहत ‘भिखारी’ हवन राम के बनावल हे।

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