क्यों आज भी खाली हैं बिहार के प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों की दो तिहाई सीटें?

ये आंकड़े आपको हैरत में डाल सकते हैं. जिस राज्य से सालाना दो लाख लड़के देश के अलग-अलग इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन लेते हैं, उस राज्य के प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों की दो-तिहाई सीटें खाली हैं. मगर यह सच्चाई है, राज्य के 15 प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों की कुल 5500 सीटों में से अब तक 34 फीसदी सीटें ही भरी गयी हैं. शेष सीटें खाली हैं. हालात ऐसे हो गये हैं कि इनमें से कई इंजीनियरिंग कॉलेज बंदी की कगार पर हैं, कुछ तो बंद भी हो गये हैं.

ऐसे हालात क्यों हैं? आपको याद होगा कि 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यह मुद्दा उठाया था कि जिस राज्य से उच्च शिक्षा के लिए हर साल चार से पांच लाख बच्चे बाहर जाते हैं, वहां इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज क्यों नहीं खुल सकते? आज बिहार में मोदी जी की पार्टी सत्ता में है और बिहार को हर मामले में शीर्ष तक पहुंचाने का दम भरने वाले नीतीश भी हैं, मगर हालात और बुरे हुए हैं.

आखिर क्यों इन बच्चों के लिए राज्य में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हो पा रही. आर्यभट्ट विवि खुला, निजी इंजीयरिंग कॉलेज खोलने के लिए प्रवासी बिहारियों को न्योता दिया गया. कई जगह कॉलेज खुले. उत्साह में बड़ा जबरदस्त काम हुआ. बक्सर में तो एक ऐसा कॉलेज खोला गया जिसने कहा कि हम अभिभावकों से गाय लेकर बच्चों को एडमिशन देंगे. बिहारशरीफ में एक सज्जन ने विदेश से आकर इंजीनियरिंग कॉलेज खोला. हालांकि संख्या फिर भी नगण्य ही थी, मगर 15 के करीब प्राइवेट कॉलेज खुले.

काश, इन कॉलेजों को सुविधाएं और प्रोत्साहन दिया जाता तो कुछ और लोगों ने भी कॉलेज खोलने की हिम्मत दिखाई होती. मगर सरकारी सहयोग का आलम यह है कि जो खुले थे वे अब बंद करने की स्थिति में आ गये हैं. एक ऐसे ही कॉलेज के डॉयरेक्टर नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि वजह बहुत छोटी सी है. व्यक्तिगत खुन्नस की वजह से साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने तय कर लिया है कि सारे प्राइवेट कॉलेजों को तबाह कर देंगे.

वे कहते हैं, जहां झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश और पंजाब जैसे दूसरे राज्यों में यह नियम है कि इंजीनियरिंग कॉलेज प्लस टू के नंबरों के आधार पर इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन ले सकते हैं, अपने राज्य में नियमावली तैयार होने और एआइसीटी से मान्यता मिलने के बावजूद उसे लागू नहीं कराया जा रहा है. ऐसे में जाहिर है कि बड़ी संख्या में छात्र दूसरे राज्यों का रुख करते हैं. हम एक्जाम के रिजल्ट का इंतजार करते रह जाते हैं.

एक इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक बिहार सरकार के आह्वान पर आस्ट्रेलिया लौट आये थे और यहां कॉलेज खोला. मगर नीतियों की गड़बड़ी की वजह से उनकी सीटें भी खाली रह जाती है. वे कहते हैं, अपने यहां प्लस टू का रिजल्ट लेट से आता है और कंबाइन एक्जाम पहले हो जाता है. ऐसे में कम ही बच्चे एक्जाम में एपियर हो जाते हैं.

सच्चाई यह भी है कि पिछले दिनों लगातार इंजीनियरिंग कोर्सेस के प्रति अच्छे छात्रों का रुझान घटा है. मगर औसत प्रतिभा वाले छात्रों की पहली पसंद आज भी यही कोर्स है. ये एक्जाम में एपियर या पास न भी हों तो भी इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन ले ही लेते हैं. पूरे पाठ्यक्रम में एक छात्र का औसतन पांच से सात लाख खर्च होता है. इस लिहाज से एक 20 अरब की मोटी राशि तो हर साल बिहार से बाहर जाती ही है. और देखा जाये तो कॉलेजों में गुणवत्ता का कोई फर्क नहीं होता. तो फिर सरकार अपने इंजीनियरिंग कॉलेजों को क्यों प्रोमोट नहीं करती. क्यों इतना पैसा बाहर जाने देती है? ऐसे में बिहार में कोचिंग उद्योग तो खूब फल-फूल रहा है, और इन्हें सरकार भी सपोर्ट कर रही है, मगर इंजीनियरिंग कॉलेज जड़ भी नहीं जमा पा रहे.

प्रिंसिपल सेक्रेटरी महोदय के खुन्नस की वजह है कि एक इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक बार-बार उन पर मुकदमा कर देते हैं. अगस्त महीने में तो हालत यह थी कि राज्य के इंजीनियरिंग कॉलेजों की 85 फीसदी सीटें खाली थीं. उनके मुकदमे के बाद फिर से एक्जाम हुआ और कुछ कॉलेजों की सीटें थोड़ी भरीं. और आंकड़ा 66 फीसदी तक पहुंचा. मगर डॉयरेक्ट एंट्री वाला नियम अब भी लागू नहीं हुआ. कहते हैं, सेक्रेटरी महोदय ने तय कर लिया है कि जब तक वे रहेंगे, ऐसा होने नहीं देंगे. वे अपनी मरजी चला रहे हैं, सीएम को कोई मतलब नहीं. ऐसे में तो यही होना है.

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