क्या हर बार अभिनय करते हुए पकड़े जाना ही राहुल गांधी की ट्रैजडी है?

क्या सचमुच राहुल गांधी की यह ट्रैजडी है कि उनकी पार्टी, उनके अभिभावक और उनके सिपहसालार उनके खूबियों पर भरोसा नहीं करते. हर बार उन्हें एक पीआर कैंपेन उपलब्ध कराते हैं और उसे कॉपी करने का दवाब डालते हैं. लिहाजा अभिनय का तिलिस्म टूट जाता है और हर बार उनकी हर कोशिश एक कॉमेडी में बदल जाती है? जैसा कि इस दफा हुआ, जब एक ट्विटर यूजर ‘आयरनी मैन’ ने उनके हालिया बहुप्रचारित और बहुप्रशंसित पोलिटिकल कैंपेनिंग की ऐसी-तैसी कर दी और सिलसिलेवार तरीके से बताया कि यह तो कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो की हूबहू कॉपी है. चाहे वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लेक्चर देना हो, जुडो फाइटिंग दिखाना हो, कुत्ते को ट्विटर पर लाना हो या छात्राओं के साथ सेल्फी लेना हो. राहुल गांधी ने हाल के गुजरात इलेक्शन कैंपेन में सबकुछ वही किया जो जस्टिन ट्रूडो ने पिछले दो सालों में किया है.

Justin Trudeau
20 अक्तूबर, 2015 को एक छात्रा ट्रुडो के पास सेल्फी लेने पहुंच गयी. 

और यह मानने में किसी को कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि राहुल गांधी ने जानते-समझते ऐसा किया होगा. या उनके सलाहकारों ने उनसे ऐसा करवाया होगा. क्योंकि राहुल गांधी और जस्टिन ट्रुडो की तुलना कोई नयी नहीं है. अक्तूबर, 2015 में जब कनाडा में इलेक्शन हो रहे थे, तब ग्लोब एंड मेल के एशिया पैसिफिक कॉरस्पोंडेंस इयान मार्लो ने दोनों की तुलना करते हुए एक आर्टिकल लिखा था कि कैसे पोलिटिकल फैमिली से आने वाले ये दोनों चॉकलेटी युवा पोलिटिशियन एक जैसे हैं और इनके सामने एक जैसे अपोनेंट भी हैं. उस वक्त के कनाडाई पीएम स्टीफन हार्पर भी मोदी जैसे ही बताये जाते हैं. उन्हें की तरह मुखर, बेहतर ट्रैक रिकार्ड वाले, अनुभवी, कारोबारियों के दोस्त और दक्षिणपंथी.  https://www.theglobeandmail.com/opinion/similarities-between-trudeau-and-indias-gandhi-are-uncanny/article26693897/?arc404=true

उसके बाद से लगातार अंगरेजी मीडिया ने यह लिखा कि दोनों एक जैसे हैं. आप डेली ओ पर अशोक स्वैन ने 15 जनवरी को इसी साल लिखा कि क्या राहुल गांधी भारत के जस्टिन ट्रुडो हो सकते हैं? कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस बात पर बहस भी चली कि क्यों राहुल गांधी जस्टिन ट्रुडो नहीं हो सकते हैं, या हो सकते हैं.

http://www.livemint.com/Home-Page/DqVOqfNMVNhs4ah6FFMeiK/Politics-in-Canada-and-India.html

यह सच है कि इन दोनों में कई चीजें एक जैसी हैं. ट्रुडो भी राजनीतिक परिवार से आते हैं, उनके पिता 15 साल तक कनाडा के पीएम रह चुके हैं. ट्रुडो भी स्मार्ट और गुडलुकिंग हैं, 46-47 के लपेटे में आते हैं. लिबरलों के प्रिय हैं. स्टीफन हार्पर के सामने अनुभवहीन लगते थे. मगर उन्होंने अपनी अनुभवहीनता को हथियार बनाया और लोगों से जुड़ना शुरू किया. आम लोगों की तरह बिहेव किया और लोगों की अपेक्षाओं के विपरीत 2015 में चुनावी जीत दर्ज की. कहते हैं, स्टीफन हार्पर हार को पचा नहीं पाये और उन्होंने राजनीति को अलविदा कर दिया.

dog truइतना सबकुछ होने की वजह से यह सहज और कंपेलिंग था कि राहुल गांधी ट्रुडो जैसा बनने की कोशिश करने लगते. और उनसे ऐसा कराया जाने लगता. कभी वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मास्टर दिखते तो कभी जुडो के एक्सपर्ट. कभी छात्रा जबरन उनके साथ सेल्फी लेने पहुंच जाती तो कभी वे ट्विटर पर कुत्ते के साथ नजर आते. दिलचस्प है कि ट्रुडो ने यह सब तक किया जब वे पीएम बन चुके थे. और उनके इस तरह के एक्शन पूरी दुनिया में पापुलर हुए. क्या राहुल के रणनीतिकारों ने यह नहीं सोचा कि यह सब बहुत आसानी से जाहिर हो सकता है. नकल पकड़ी जा सकती है.

दरअसल राहुल और उनके रणनीतिकारों ने ट्रुडो की रणनीति की कॉपी तो की, मगर थीम को समझ नहीं पाये. ट्रुडो ने अपनी छवि इन कारोबारों से नहीं बनायी. उसने सिर्फ इतना किया कि स्टीफन हार्पर जैसा बनने की कोशिश नहीं की. जैसे थे वही दिखे, जो सोचा वही किया. अपनी सहजता में रहे. मगर राहुल लगातार दूसरों जैसा बनने की कोशिश करते हैं. कभी केजरीवाल को कॉपी करते हैं तो कभी मोदी को. कभी कुरता चढ़ाते हैं तो कभी आर्डिनेंस फाड़ कर फेंक देते हैं. इन बार उन्होंने एक विदेशी पीएम की नकल की है, जिसे उनके जैसा कहा जाता है. यह नकल की वृत्ति उन्हें आगे बढ़ने नहीं देती. काश वे अपनी तरह के होते, अपने हिसाब से राजनीति करते. जो उन्हें करने नहीं दिया गया, न करने दिया जायेगा. क्योंकि राहुल गांधी की ट्रैजडी ही यह है कि खुद कांग्रेस पार्टी उन पर भरोसा नहीं करती.

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