क्या पुरस्कारों की योग्यता मठाधीशों की चाटुकारिता भर होती है? #पटनापुस्तकमेला

Shashank Mukut Shekhar ने पटना पुस्तक मेला में बंटे पुरस्कारों पर कुछ तीखे सवाल किये हैं. हालांकि हम बहुत आश्वस्त नहीं हैं कि ये आरोप सही हैं या गलत. मगर एक युवक के सवालों को सार्वजनिक पटल पर आना चाहिए इसलिए उनकी बातों को हमने जगह दी है. अगर कोई पक्ष इससे असहमत है तो वह भी हमें अपना पक्ष भेजे हम उसे भी जगह देंगे. हमारा ई-मेल है, biharcoverez@gmail.com फिलहाल उनकी यह टिप्पणी पढ़ी जाये.

शशांक मुकुट शेखर

मैंने पहले भी पटना पुस्तक मेला के इस संस्करण की खामियां गिनाई थी. इस मेले को ‘ज्ञान’ को ‘भवन’ में कैद करने की तैयारी कहना बहुत हद तक सच साबित होता दिखाई दिया. अपनी तमाम विफलताओं के बीच सोमवार को पुस्तक मेला का समापन हो गया. और समापन से ठीक पहले एक ऐसा कार्यक्रम हुआ जिसने पुस्तक मेला के सबसे निचले स्तर को उजागर किया.

कार्यक्रम था 24वें पटना पुस्तक मेला में दिये गये पुरस्कारों का. और साहित्य जगत के ज्यादातर पुरस्कारों की तरह ही इन पुरस्कारों में भी चाटुकारिता और चरण-वंदन की भूमिका अपने चरम पर दिखी. निर्णायक मंडल में शामिल अपने-अपने क्षेत्र के तथाकथित विभूतियों के पक्षपातपूर्ण चयन को ही पुरस्कार मिले. विद्यापति पुरस्कार, यक्षिणी पुरस्कार, भिखारी ठाकुर पुरस्कार तथा सुरेन्द्र प्रताप सिंह स्मृति पुरस्कार का आवंटन कार्यक्रम अपने चहेतों के बीच अवार्ड्स बाँटने का समारोह बस लगा.

यक्षिणी पुरस्कार मुरारी झा को प्रदान किया गया. चारों में एकमात्र यह ही एक सही चयन प्रतीत हुआ. बांकि के तीनों पुरस्कारों में फेवरेट चरण-पुजारियों को ही प्रतीक चिन्ह व 9000 की राशि से सुशोभित किया गया.

लेखन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए विद्यापति पुरस्कार जिस 20 वर्षीय कवियत्री को मिला उसका नाम पटना में साहित्य की हम युवा पौध में से शायद ही किसी ने सुना हो. फिर कवियत्री के मुखारबिंद से ही यह ब्रेकिंग न्यूज़ मिली कि फरवरी में एक बड़े प्रकाशन से इनका कविता संग्रह भी आ चुका है. क्या एक बड़े प्रकाशन से किताब आ जाने से आप अच्छे कवि बन जाते हैं?

यह आर्टिकल लिखने से पहले इनकी कुछ कविताएँ पढ़ी. पढ़ने पर इस पुरस्कार के चयन संबंधित बची-खुची आशंकाएं भी यकीन में बदल गई. क्या निर्णायकों को बिहार में साहित्य में और कोई प्रतिभाशाली युवा नहीं दिखा ? क्या उन्होंने चयन करने से पहले वर्तमान दौर के दूसरे युवा कवियों/लेखकों की रचनाओं पर नजर डाला? इससे तो यही समझ में आता कि अगर आप किसी वरिष्ट कवि/साहित्यकार के करीबी हैं तो आपको अवार्ड्स आसानी से मिल सकता है. आपमें प्रतिभा है या आप उसके काबिल हैं, इससे कोई मतलब नहीं.

रंगमंच में विशिष्ट योगदान के लिए भिखारी ठाकुर पुरस्कार जिस युवक को दिया गया क्या उससे बेहतर एक भी बिहारी अभिनेता रंगमंच में सक्रिय नहीं? इस सवाल का जवाब सोचने भर से इस आवर्ड की पोल खुल जाएगी. दरअसल फिल्म और रंगमंच के क्षेत्र में शहर के बड़े नाम का इस अवार्ड के चयन में अत्यंत सूक्ष्म योगदान है. जाहिर है पुरस्कार किसी असल प्रतिभा को कैसे मिलता. ऐसी घटना जहाँ असली प्रतिभा को आगे बढ़ने से रोकती है वहीँ साहित्य और रंगमंच के प्रति विश्वशनियता को भी प्रभावित करती है.

खुद को एक छोटा-मोटा पत्रकार मानता हूँ तो सुरेन्द्र प्रताप सिंह स्मृति पुरस्कार ने ज्यादा अचंभित किया. यह पुरस्कार जिसे पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया, बिहारी पत्रकारिता जगत में क्या सच में इनका योगदान विशिष्ट है? या मुझे जानकारी का घोर अभाव है? उड़ती-उड़ती खबर तो यह भी आई कि इस पुरस्कार के लिए निर्णायक मंडल में शामिल एक महाशय को तो इसकी खबर भी नहीं थी कि वे निर्णायक मंडल में हैं. अब आगे ज्यादा कहना शब्दों की बर्बादी भर होगी.

कुछ छानबीन की तो पुस्तक मेला के आयोजकों ने यह कहकर पाला झाड़ लिया कि वे इन पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में शामिल ही नहीं… पुस्तक मेला के आयोजक का ऐसा कहना हजम होता है भला..? मतलब खाएं भी जम के और डकार भी ना लें .

मैं एक कवि हूँ. सोचता ज्यादा हूँ. जब शहर में युवाओं को मेहनत से आगे बढ़ते देखता हूँ तो आत्मिक संतुष्टि मिलती है. मगर जब इस तरह चाटुकारिता से लबालब चीजें देखता हूँ तो तकलीफ ज्यादा होती है. हम किस साहित्य को उन्नत बनाने की बात करते हैं? और किस तरह के निष्पक्ष पत्रकारिता की बात करते हैं? सबसे ज्यादा दुःख देता है इनके पुराधाओं/मठाधीशों और स्वघोषित प्रेमियों के मुख पर यह सब होता देख एक कुटिल मुस्कान देखकर. यह साहित्य और पत्रकारिता का पतन नहीं तो और क्या?

 

(यह लेखक के निजी विचार हैं, उनकी बातें सामने आये इसलिए हमने इन्हें जगह दिया है, अगर किसी पक्ष को आपत्ति हो तो हम उनके विचार भी सहर्ष प्रकाशित करेंगे.)

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