क्या पटना सीखेगा रोहतास के इस गांव से साफ-सफाई का सबक?

आनंद कुमार

रोहतास आबादी के लिहाज से इसलिए भी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यहाँ प्रति हज़ार पुरुषों की तुलना में महिलाओं की गिनती ज्यादा है। औसत हर 1000 पुरुषों पर यहाँ 1036 महिलाऐं हैं। सिर्फ आंकड़ों के लिहाज से देखें तो कुछ चीज़ें अजीब भी लगेंगी। जैसे महिलाओं की गिनती ज्यादा होने के वाबजूद बाल विवाह की दर 15-19 वर्ष की स्त्रियों में 38% के आस पास है और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने वाले करीब 45% लोगों में पुरुष भागीदारी ना के बराबर है। 40% के लगभग स्त्री-बंध्याकरण पर ही निर्भर हैं।
ऐसी ही जगह जब हम स्वच्छता अभियान के बारे में पूछ बैठे तो अचना अकचका कर पीछे हटने को हुए। हमें तो एक दो मिमियाती सी आवाजों की उम्मीद थी। इतने तेज से “जी” के उद्घोष ने चौंका दिया था। मोदी जी ने जिस “स्वच्छाग्रह” की शुरुआत की थी, उसमें होता क्या है ये जानने के लिए हम जमीनी कार्यकर्ताओं से बात कर रहे थे। रोहतास जिला करीब करीब खुले में शौच से मुक्त है। वहां 2% से भी कम लोग खुले में शौच करते हैं तो हमने वहीँ के लोगों से बात शुरू करनी चाही।
पूछताछ के क्रम में पता चला कि सभी गाँव वाले जानते हैं कि स्वच्छाग्रह करीब करीब सत्याग्रह जैसा ही है। इस अभियान का एक हिस्सा “जिद करो” भी था। अब “जिद करना बुरी बात है” सीखते बड़े हुए हमारी पीढ़ी को लगता है कि जिद कोई अच्छी चीज़ तो होती नहीं। मैंने यही सोचते हुए पूछा कि ये “जिद करो” क्या है? पता चला कि बच्चे शौचालय बनवाने के लिए जिद करते हैं। बच्चों की मांगें अक्सर मान भी ली जाती हैं, इसलिए “स्वच्छाग्रह” में इसे भी शामिल किया गया है।
गावों में चलने वाले स्वच्छता अदालतों के बारे में जानते ये पता चल गया था कि इसमें गाँव के बच्चे भी शामिल होते हैं। बच्चों से ये पूछते वक्त कि क्या किसी ने जिद करके शौचालय बनवाने में कामयाबी पाई, मैंने सोचा था कि शायद दो चार बच्चों ने ऐसा किया होगा। सामने करीब सौ या शायद सवा सौ बच्चियां बैठी थीं। कुछ नाटकों के लिए साड़ी और दूसरे परिधानों में सजकर आई थीं, और बाकी सभी अपने स्कूल यूनिफार्म में।
अगर आप बिहार के सरकारी स्कूलों से अच्छी तरह वाकिफ नहीं, तो बताते चलें कि यहाँ हर जिले में एक कस्तूरबा विद्यालय नाम से जाना जाने वाला स्कूल भी होता है। इस विद्यालय की ख़ास बात ये होती है कि इसमें अनुसूचित जाति के अत्यंत निर्धन परिवारों से आने वाली सौ बच्चियों के रहने-खाने और पढ़ने की व्यवस्था होती है। उन्हें मुफ्त किताबें, उचित पोषण, स्कूल की ड्रेस जैसी चीज़ें मुफ्त, सरकार की तरफ से, मुहैया करवाई जाती हैं।
नरवर भागीरथा में मेरे सामने ऐसी ही बच्चियां थीं जिनके परिवार को शिक्षा का महत्व समझाने में बरसों लगे। इनमें से ज्यादातर अपने परिवार से स्कूल जाने वाली पहली पीढ़ी की लड़कियां ही हैं। हंसती-खिलखिलाती इन लड़कियों से हमने घुमा-फिरा कर एक ही सवाल बार बार करने की कोशिश की, शायद कोई कह दे कि उसके घर शौचालय नहीं! हमने गाँव में घूमकर देखने की कोशिश की, सड़कों के आस पास की सफाई भी गाँव के खुले में शौच से मुक्त होने की गवाही देती थी।
इसे लिखते वक्त हम गाँव की बच्चियों से मिलकर शहर लौट आये हैं। रोहतास के इस गाँव से पटना की सफाई कि तुलना करने जैसी हिम्मत नहीं की है। आत्मसम्मान और गौरव से भरा जैसा “जी” नरवर भागीरथा की लड़कियां सुना सकती हैं, उस हुंकार के लिए नैतिक साहस चाहिए। बिहार ही नहीं पूरे देश को ये सोचने की जरूरत है। अगर पूछा जाए कि क्या हमारे देश में भी सफाई होगी? आपके गाँव में होगी, आपके पंचायत स्वच्छ होंगे, आपका मोहल्ला, आपका शहर अगर कोई देखने आ जाए और पूछे साफ़-सुथरा होगा क्या? तो क्या जवाब देंगे?
नरवर भागिरथा की लड़कियों जैसा “जी” कह देने की हिम्मत है सरकार?
ऐसे ही जिले के एक छोटे से गाँव की लड़की सोनल की तस्वीरें जब UNICEF और स्वच्छ भारत मिशन के कार्यक्रमों में दिखने लगी तो हमने सोचा कि ये लड़की सचमुच वैसा कर चुकी है जैसा बताया जा रहा है? मिलने पर पता चला मुरली और बबिता पासवान की ये बेटी अभी अभी नौंवी कक्षा में गयी है। आठवीं तक जब “बाल-संसद” में ये प्रधानमंत्री की भूमिका संभालती, तो भाषण भी देती थी। वहीँ से इसे सत्याग्रह और शौचालय बनवाने के बारे में पता चल गया। भाषणों में इन विषयों पर बोलते एक दिन इसे लगा कि शौचालय की वकालत करते उसके खुद के घर में शौचालय कहाँ है?
सोनल ने शौचालय के लिए सत्याग्रह की ठान ली। वो भूखी प्यासी तीन दिन कमरे में बंद रही जबतक कि परिवार के लोगों ने शौचालय के लिए हामी नहीं भर दी! सोनल का परिवार बहुत पढ़ा लिखा नहीं, उसके पिता मजदूरी करते हैं। अनुसूचित जाति से आने वाली सोनल ने भाषणों की नक़ल करने में स्वच्छाग्रह सीख लिया। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि “भाषणों से पेट नहीं भरता साहेब!” कम से कम भाषणों से लोग सही जगह पेट खाली करना तो जरूर सीख जाते हैं। शौच तो शौचालय में ही होना चाहिए !

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