कौन है भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा नौटंकीबाज

मोदी जी ने बनारस में सफाई कर्मियों के पैर धोते हुए फोटुएं खिंचवाई. जाहिर सी बात है इन फोटुओं को वायरल होना था. कई लोगों ने इसे युगांतकारी कदम बताया, तो कई लोगों ने फुलप्रूफ पोलिटिकल नौटंकी. दोनों धड़े फेसबुक पर अपने अपने तर्कों के साथ लड़ रहे हैं. मैं वैचारिक तौर पर सफाई कर्मियों के लिए संघर्ष करने वाले मैग्सेस अवार्ड विजेता बेजवाड़ा विल्सन के साथ हूं, वे कहते हैं कि पैर धोने से मोदी जी तो महान हो सकते हैं, मगर हर रोज देश के किसी न किसी गटर में डूबकर मर जाने वाले इन सफाई कर्मियों की मुश्किलें कम नहीं होने वाली, उनकी बातों में इसलिए भी दम है, क्योंकि वे रोज इन लोगों के लिए जीते और मरते हैं.

यह सच है कि मोदी जी ने जो किया वह पोलिटिकल नौटंकी है, चुनावी स्टंट है. मगर सच यह भी है कि जो विपक्षी दल आज इस चुनावी स्टंट का विरोध कर रहे हैं, कल वे यही करते नजर आयें तो इसमें किसी को आश्चर्य न हो. आखिर हमने इसी जमाने में राहुल गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण बनते देखा है, केजरीवाल को प्लास लेकर बिजली कनेक्शन जोड़ते देखा है. सच यही है कि यह जमाना पोलिटिकल नौटंकियों का ही है, और आज इस नौटंकी के बादशाह खुद नरेंद्र मोदी हैं.

याद कीजिये, जिस संसद में राहुल गांधी ने हाल ही में मोदी को गले लगाया था, उसी संसद की चौखट पर मोदी जी ने पहले मत्था टेका था, फिर अचानक एक रोज वे फूट-फूट कर रोने लगे थे. और उससे पहले एक रात केजरीवाल दिल्ली की सड़क पर रजाई ओढ़े सोते पाये गये थे. और उससे भी पहले राहुल गांधी गरीबों की कुटिया में जाकर खाना खाते हुए फोटो खिंचवाते थे और भाजपा वाले उनकी इस नौटंकी पर हंसा करते थे. बाद में कुटिया में खाने का ट्रेंड इतना हिट हुआ कि भाजपा के तकरीबन हर बड़े नेता ने यह काम करके दुनिया को दिखाया.

तो सच यही है, नौटंकी हर कोई कर रहा है. हां, आज के टाइम में मोदी जी की नौटंकियां ज्यादा हिट हो रही हैं. वे ट्रेंड सेट कर रहे हैं. यह उन्हीं की नौटंकियों का कमाल है कि देश की राजनीति अचानक हिंदूवादी हो गयी और कट्टर से कट्टर धर्मनिरपेक्ष दलों ने मुसलमानों से परहेज करना शुरू कर दिया. राजनीति में अचानक सवर्ण महत्वपूर्ण हो गये और जब गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की घोषणा की गयी तो किसी भी राजनीतिक दल में इसका खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं थी.

एक जमाने में राजनीति दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों के इर्द-गिर्द घूमती थी. बीपीएल, मनरेगा, अधिकार, समानता आदि भाषणों के कीवर्ड हुआ करते थे. मगर अब भाषणों में देश, हिंदू, फौजी, राष्ट्रवाद, देशद्रोही, गाय जैसे शब्द प्रमुख हो गये हैं. और इसकी वजह यही है कि आज की राजनीति का एजेंडा मोदी और संघ वाले सेट कर रहे हैं, बाकी लोग बस उसे फोलो कर रहे हैं. वे अपनी तरफ से कोई डिबेट क्रियेट नहीं कर पा रहे.

हालांकि यह सब उतना जोरदार नहीं है, जैसा कि 2013-14 के दौर में हुआ करता था, जब मोदी जी को कांग्रेस द्वारा फेकी गयी हर गेंद फुटब़ॉल मालूम होती थी, और वे सहवाग की तरह चौके-छक्के जड़ा करते थे. साढ़े चार साल कुरसी पर बैठने के बाद उनकी असलियत लोगों को समझ में आने लगी है. क्योंकि सिर्फ बातों और नौटंकियों से आप लंबी पारी नहीं खेल सकते.

लोगों को नोटबंदी का हश्र मालूम है, काला धन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी पर उनके दावे और उनकी हकीकत मालूम है, जीएसटी की चुभन का एहसास है. जो लोग पहले दावे के साथ कहते थे, कि मोदी कुछ अलग करेगा, करके रहेगा, वे भी दबे स्वर में जरूर कहते हैं, है तो भाषणबाज ही, काम कुछ नहीं किया, लेकिन…

लेकिन, हिंदुओं की ताकत को बढ़ाया है. मुसलमानों को सैंत कर रखा है. आम हिंदुओं में यह जो अहसास है, उसी ने आज भी तमाम नाकामियों के बावजूद मोदी जी को अपर हैंड पर रखे हुए है. इसके अलावा एक ताकतवर संगठन है. संगठन के लिए चौबीसो घंटे एक्टिव रहने वाला अध्यक्ष है. इसलिए मोदी जी की पोलिटिकल नौटंकियां चल रही हैं और केजरीवाल जो इस देश में पोलिटिकल नौटंकियों के सबसे स्मार्ट खिलाड़ी थे, खारिज हो चुके हैं. क्योंकि उनकी नौटंकियों को महान कदम बताकर देश भर में गुंजायमान करने वाले कार्यकर्ता नहीं हैं. राहुल गांधी के पास कार्यकर्ता बचे हैं, औऱ बन रहे हैं. मगर वे न मोदी हो पा रहे हैं, न अमित शाह. इसके बावजूद दोनों काम अकेले करने की कोशिश कर रहे हैं. लिहाजा उनकी नौटंकियां भी कई बार बैक फायर कर जा रही हैं.

इसके बावजूद चुनाव है तो नेताजी नौटंकियां करेंगे ही. मगर नेताओं की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे अक्सर भूल जाते हैं, इस देश में अगर सबसे बड़ा नौटंकीबाज कोई है तो वह वोटर है. वह कब किस ओर पासा पलट देगा इसका अनुमान लगाना किसी के बस की बात नहीं. याद कीजिये 2004, जब मान लिया गया था कि फील गुड फैक्टर के साथ वाजपेयी दुबारा आ रहे हैं, मगर नौटंकीबाज वोटरों ने एक विदेशी महिला के हाथों कमान सौंप दी. कांग्रेसी इस बार भी उसी भरोसे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इंडियन वोटर है तो सबकुछ मुमकिन है.

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