किशनगंज में आखिर क्यों कोई एनडीए नेता चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं है?

जी हां, यह अजीब सिचुएशन है. किशनगंज पहुंचते ही इस सिचुएशन का पता चला. यहां के स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि भले ही देश में भाजपा और एनडीए की तूती बोल रही हो. उसके टिकट के लिए मारामारी चल रही हो, मगर किशनगंज लोकसभा सीट से कोई बड़ा एनडीए नेता चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं है. बीजेपी से एक बार लोकसभा चुनाव लड़े चुके पार्टी के कोषाध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने भी अब मना कर दिया है, वे चाहते हैं कि उन्हें किशनगंज छोड़कर किसी दूसरे सीट से टिकट दिया जाये. यहां तक कि जदयू के पापुलर विधायक(कोचाधामन) मास्टर मुजाहिद ने भी पार्टी को मना कर दिया है. ऐसे में जानकारों का मानना है कि अंततः भाजपा यह सीट जदयू के लिए छोड़ देगी और जदयू अपने दूसरे विधायक ठाकुरगंज के नौशाद आलम को चुनाव लड़ने के लिए मना लेगी.

आखिर ऐसी सिचुएशन आने की वजह क्या है?  अमूमन जानकार बता रहे हैं कि इसकी वजह इस लोकसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों का बाहुल्य है, जिस वजह से एनडीए की यहां से जीतने की संभावना नगण्य है. स्थानीय पत्रकार अवधेश बताते हैं कि किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में मुसलमान वोटरों की संख्या कुल वोटरों की लगभग 80 फीसदी है, इसलिए भी एनडीएन के प्रत्याशी की जीत की कोई संभावना नहीं है. यही वजह है कि कोई नेता एनडीए के टिकट से दिल से चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं है.

हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि किशनगंज लोकसभा सीट से भाजपा का जीतना नाममुकिन ही रहा है. 1999 में इसी लोकसभा सीट से भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन चुनाव जीत चुके हैं. मगर तब की स्थिति अलग थी. उस वक्त किशनगंज लोकसभा सीट में अररिया जिले के दो हिंदू बहुल विधानसभा सीट शामिल थे. बाद में हुए परिसीमन में उन दो सीटों को अररिया में शामिल कराकर पूर्णिया के दो मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्र अमौर और बायसी को किशनगंज लोकसभा सीट में शामिल करा दिया गया. जिससे किशनगंज मुस्लिम प्रत्याशी के लिए अभेद्य किला बन गया.

शाहनवाज के बाद से कोई भाजपा या यहां तक कि जदयू नेता भी इस सीट से चुनाव जीत नहीं पाया है. 2004 में तस्लीमुद्दीन ने राजद के टिकट पर शाहनवाज को हराकर चुनाव जीता. 2009 और 2014 में मौलाना असरारुल हक कासमी की वजह से यह क्षेत्र कांग्रेस की स्थायी सीट बन गया. हालांकि हाल ही में उनका निधन होने की वजह से कांग्रेस भी पशोपेश में है कि इस सीट पर अब किसे टिकट दे.

यहां कांग्रेस की टिकट के दो दावेदार हैं. पहले तो मौलाना साहब के भाई जाहिदुर रहमान जो बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, वे भावनात्मक आधार पर कांग्रेस से टिकट चाह रहे हैं. दूसरे हैं डा. जावेद आजाद जो किशनगंज के एमएलए हैं. उनकी छवि बेदाग बतायी जाती है. बहादुरगंज के विधायक तौसीफ़ आलम भी दावा पेश कर रहे हैं. इस सीट से कांग्रेस के जीतने की संभावना सबसे अधिक है, इसलिए कांग्रेस की टिकट के लिए मारामारी है.

भाजपा के किशनगंज जिले के अध्यक्ष राजेश्वर वैद भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पिछले चुनाव में इस सीट से भाजपा के उम्मीदवार रहे दिलीप जायसवाल ने इस बार चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है. एनडीए के दूसरे उम्मीदवार भी इस सीट से चुनाव लड़ने से हिचकते हैं. इसकी वजह वे यह बताते हैं कि इस सीट पर धार्मिक आधार पर पोलराइजेशन हो जाता है और भाजपा को मुसलिम समाज का वोट नहीं मिलता है. जबकि भाजपा की केंद्र और राज्य की सरकारों ने कभी विकास के नाम पर इस क्षेत्र की उपेक्षा नहीं की. इसके बावजूद यहां के मुसलिम समाज के लोग भाजपा और एनडीए से परहेज करते हैं.

हालांकि अब भी इस बात को लेकर आशांवित हैं कि टिकट भाजपा के प्रत्याशी को ही मिले. वे कहते हैं, यह ठीक है कि शाहनवाज हुसैन के बाद हमने कभी यहां चुनाव नहीं जीता. मगर टक्कर तो हम देते ही रहे हैं. दूसरी पार्टियां इतनी मजबूत टक्कर दे नहीं पाती है.

किशनगंज के सबसे पापुलर सोशल मीडिया ग्रुप खबर सीमांचल के मोडरेटर हसन जावेद कहते हैं, भाजपा नेता दिलीप जायसवाल की पार्टी में छवि जैसी भी हो, मगर वे मानकर चल रहे हैं कि अगर वे यहां से चुनाव लड़ेंगे तो इसका मतलब हारना ही होगा. 2014 के चुनाव में पार्टी के निर्देश पर वे यहां यह कुर्बानी दे चुके हैं, हालांकि इसके एवज में उन्हें विधान परिषद भेजा गया. मगर अब वे हारने के लिए चुनाव लड़ने का रिस्क लेना नहीं चाहते.

हसन का मानना है कि आखिर में मास्टर मुजाहिद चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे. हालांकि कई दूसरे जानकार का कहना है कि ऐसा नहीं भी हो सकता है, क्योंकि किशनगंज में इस आर या पार के चुनाव में किसी मुसलिम नेता का बीजेपी का हाथ मजबूत करने की कोशिश उसके राजनीतिक कैरियर के लिए आत्मघाती भी हो सकता है. इसलिए शायद ही कोई मजबूत मुस्लिम नेता एनडीए की तरफ से लड़ने के लिए तैयार हो. इसी किशनगंज में पिछले लोकसभा चुनाव में तत्कालीन जदयू उम्मीदवार अख्तरुल इमान ने आखिरी वक्त में खुद को चुनाव से बाहर कर लिया था, ताकि कहीं उनकी वजह से भाजपा को लाभ न पहुंचे. हालांकि इस बार दिलचस्प बात है कि अख्तरुल इमान ओबैसी की पार्टी की कमान थामे हैं. जिसकी छवि एक तरह से वोटकटुआ की रही है.

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