‘काश! हम फोड़ियों के जीवन में भी होता मखान जैसा उजाला’

पौष्टिकता से भरपूर आर्गेनिक वेफर्स मखान. आप अगर पटना में इसे खरीदेंगे तो कहीं भी चार सौ रुपये किलो की दर से कम में नहीं मिलेगा. दिल्ली-मुम्बई तक जाते-जाते तो इसकी कीमत छह-सात सौ रुपये हो जाती है. मिडिल ईस्ट में इसकी बहुत अधिक मांग रहती है. इस मखाने की फसल ने कोसी-सीमांचल के उन किसानों का खूब भला किया है, जिनके खेत साल में आठ महीने पानी में डूबे रहते थे. अब उन खेतों में मखाने की फसल उगने लगी है. इस वजह से मखाने के बीज को फोड़ कर फल निकालने वाले पारंपरिक एक्सपर्ट दरभंगा के फोड़ी भी हर साल चार से छह महीने के लिए इस इलाके में सीजनल माइग्रेशन करने लगे हैं. मगर अमानवीय स्थितियों में रहने और अपने बच्चों की पढ़ाई दांव पर लगाने के बावजूद इन फोड़ियों को अपने प्रवास में बहुत कुछ हासिल नहीं होता. पिछले एक-दो साल से इनकी स्थिति और बदतर ही हुई है. कुछ माह पहले इन फोड़ियों की बस्ती में जाने का मौका था, तब एक रिपोर्ट भी लिखी थी, कुछ तसवीरें भी हैं. आइये झांकते हैं, इन फोड़ियों के जीवन में…

पूर्णिया शहर के खुश्कीबाग में इन दिनों दरभंगा के फोड़ियों के आने का मौसम है. बांस की बनी जर्जर झोपड़ियां वाला इनका मुहल्ला फिर से आबाद होने लगा है. इसके साथ ही भुने हुए मखाने के बीज को लोहे की बड़ी सी चलनी में चालने की झिर-झिर आवाज इलाके भर में गूंजने लगी है. हालांकि इस सीजन का पहला मखान अभी फोड़ा नहीं गया है. पिछले साल के आखिर में मखान के कीमतों में जो भारी गिरावट दर्ज की गयी थी, उसका असर इन फोड़ियों के चेहरे पर साफ नजर आ रहा है. फिर भी दरभंगा जिले से हर साल आषाढ़-सावन महीने में यहां आने और पूरे कोसी-सीमांचल में पसर जाने का जो इनका जो सिलसिला है, वह इस साल भी जारी है. इससे इलाके के मखान उत्पादक किसानों में भरोसा जगा है कि इस साल भी उनकी उपज को दाम मिल ही जायेगा, भले कम-बेसी जो भी मिले.

दरअसल बांस की जर्जर झोपड़ियों में मैले-कुचैले हालात में यहां हर साल चार से छह महीने प्रवास करने वाले ये फोड़ी मखाने के बीज के खरीदार भी हैं और प्रोसेसिंग के एक्सपर्ट भी. निषाद जाति से आनेवाले ये लोग मखाने की खेती और व्यापार के बीच की वह महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जिनके बिना न किसान का काम चलता है, न व्यापारियों का. ये न हो तो यहां के तालाब, चौरों और सूख रही नदियों में उगने वाले मखान के बीज को कोई छुए तक नहीं. स्थानीय भाषा में गुड़िया के नाम से पुकारे जाने वाले इस बीज को मखाने के फल में बदलने का पारंपरिक हुनर इनके पास ही है.

ऐसे ही एक फोड़ी कमल साहनी के झोपड़े के सामने उनकी पत्नी और उनके पुत्र भुने हुए गुड़िया (मखाने के बीज) को लोहे की चलनी से चालते(साफ करते) नजर आते हैं. उनकी एक पुत्री अंदर मिट्टी के चूल्हे पर मिट्टी के बरतन में गुड़िया भून रही है और एक पुत्री बाहर बोरे पर भुनी और चाली गयी गुड़िया को सुखा रही है. इस पूरे कारोबार को अपनी तरह से संचालित कर रहे कमल सहनी कहते हैं, तीन दिन बाद हमलोग इसको फोड़ेंगे तो उसमें से मखान निकलेगा. कमल सहनी का परिवार एक दिन पहले दरभंगा के बहेड़ा से आया है. वे पिछले 15-20 सालों से पूर्णिया आ रहे हैं. चार-पांच महीने यहां रहते हैं, दशहरा-दीवाली यहीं मनता है और छठ के बाद यहां से अपने पुश्तैनी गांव लौट जाते हैं.

उनके जैसे कम से कम 50 हजार परिवार हर साल इस इलाके में मखान फोड़ने आते हैं. सहरसा, सुपौल, पूर्णिया, कटिहार, अररिया आदि जिलों में जगह-जगह इसी तरह झोपड़ियां किराये पर लेते हैं और यह कारोबार करते हैं. कमल सहनी बताते हैं, अब दरभंगा में मखान की खेती वैसी नहीं होती, जैसी कोसी और सीमांचल के इलाके में होती है. वहां तालाब सूखने लगे हैं और पानी की वैसी व्यवस्था नहीं है. जबकि इस इलाके में अभी भी काफी चौर हैं और कुछ नदियां जिनमें लगातार पानी कम हो रहा है, वहां मखाने की खेती के लिए अच्छा माहौल बन रहा है. इसलिए दरभंगा की जगह पूर्णिया मखान का बड़ा सेंटर बन गया. वहां जब हमलोगों को काम मिलना कम हो गया तो हमलोग इधर आने लगे हैं.

प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और जिंक जैसे पौष्टिक तत्वों से भरपूर मखान दुनिया भर में एक ऑर्गेनिक वेफर्स के तौर पर मशहूर है. इसकी खेती में किसी तरह का खाद या कीटनाशक इस्तेमाल नहीं होता है. इसका 90 फीसदी उत्पादन में बिहार में और खास तौर पर कोसी और सीमांचल के इस इलाके में होता रहा है. यहां के 20 हजार हेक्टेयर जमीन पर मखाने की खेती होती है, और 25 हजार टन तक मखाने का उत्पादन होता है. माना जाता है कि देश में मखाने का व्यापार 500 करोड़ रुपये का है, मगर उसका लाभ न यहां के मखान उत्पादकों को होता है, न इन फोड़ियों को.

पूर्णिया के खुश्कीबाग मुहल्ले में फोड़ियों की अस्थायी बस्ती ऐसी है कि जहां सूअर भी रहने से इनकार कर दें.

दरभंगा के बहेड़ा, बेनीपुर और बिरौल प्रखंड़ों से आनेवाले ये फोड़ी यहां जिन जर्जर और कमजोर झोपड़ियों में वे रहते हैं, उसका किराया काफी अधिक होता है. एक सीजन का आठ से दस हजार तक. इसके अलावा उन्हें 700 प्रति माह की दर से बिजली बिल भी चुकाना होता है.

इस प्रवास में उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी चौपट हो जाती है. फोड़ियों को यहां सपरिवार आना पड़ता है, क्योंकि मखान तैयार करने में हर सदस्य की अपनी-अपनी भूमिका है. किशोरवय बच्चे तो गुड़िया भूजने, चालने, सुखाने और उसे फोड़ने तक हर गतिविधि में हिस्सा लेते हैं. जो गुड़िया लकड़ी के हथौड़े से नहीं फूटती है, उसे छोटे-छोटे बच्चे अपने दांत से फोड़ते हैं. मगर इस चक्कर में इन बच्चों को चार से छह महीने के लिए स्कूल से दूर रहना पड़ता है. रामबाबू सहनी जो यहां तीन दिन पहले सपरिवार आये हैं, कहते हैं, क्या करेंगे, पहले पेट का उपाय करेंगे तब न बच्चों की पढ़ाई देखेंगे.

हालांकि इस काम में पूरे परिवार को झोंक देने के बावजूद इन फोड़ियों को बहुत कुछ हासिल हो जाता हो, ऐसी बात नहीं है. बेनीपुर से आयी एक महिला गीता देवी कहती हैं, हर आदमी के हिसाब से एक दिन की मजदूरी ढाई सौ रुपये भी निकल जाये तो हमलोग खुश हो जायेंगे. जो कमाते हैं, उसका बड़ा हिस्सा तो मकानमालिक को ही देना पड़ता है. फिर यहां रहने का खर्च अलग है. रामबाबू सहनी कहते हैं, पांच लोगों के परिवार चार बोरा मखान तैयार करने में तीन दिन लग जाता है. एक दिन भूजना, फिर सुखाना, तीसरे दिन फोड़ना. एक क्विंटल गुड़िया सात हजार रुपये में खरीदते हैं. और उससे चार बोरा यानी 40 किलो मखान तैयार होता है. अभी रेट दो सौ रुपये किलो चल रहा है. तो समझिये कि आठ हजार रुपया मिला. यानी पूरे परिवार के तीन दिन के मेहनत का मुआवजा एक हजार रुपया. इसमें किराया और बिजली बिल काट दीजिये. तीन दिन का किराया 200 रुपये और बिजली बिल 25 रुपये. तो बताइये बचा क्या. फिर जलावन का अलग खर्चा है.

खुले में सुखाया जा रहा मखान.

दरअसल पिछले कुछ सालों मे बूम पर रहा मखान का बाजार 2015 के आखिर में अचानक मंदी की तरफ चला गया है. इस वजह से मखान का खरीद मूल्य काफी कम हो गया है. कमल सहनी बताते हैं कि पिछले साल जुलाई में हमलोगों ने 280 रुपये किलो तक के रेट से मखान बेचा था. मगर साल के आखिर में यह 200 रुपये तक चला गया. आज पुराने मखाने का रेट 180 रुपये किलो है और नये का 200. चुकि हमलोग पिछले साल सात हजार रुपये क्विंटल के रेट पर गुड़िया खरीद लिये थे, इसलिए सबको नुकसान हो गया. इस साल हमलोग गुड़िया खरीदने का रेट भी कम रखेंगे, ताकि कुछ तो नुकसान की भरपाई हो. कमल कहते हैं, 2014 तक यहां से एक-एक परिवार 50 हजार से डेढ़-दो लाख तक कमा कर जाता था, मगर पिछले साल से कमाई में बट्टा लगने लगा है.

मखाने के बाजार में अचानक आयी इस मंदी की वजह मखाने के स्थानीय व्यापारी रामकुमार केसरी बताते हैं. वे कहते हैं, एक तो बाजार तेज देखकर पिछले से किसानों ने मखान की खेती का रकवा बढ़ा दिया, इसके अलावा माल सस्ता देखकर कई व्यापारियों ने मखाने का भरपूर स्टॉक कर लिया. जबकि बाहर से मांग उतनी आयी नहीं. वे कहते हैं, पहले पाकिस्तान और मिडिल ईस्ट के मखान की भरपूर मांग हुआ करती थी. क्योंकि मुसलिम समाज में मखाने का भरपूर इस्तेमाल होता है. वे हमलोगों की तरह इसे केवल भूजकर या खीर बना कर नहीं खाते. वे मटन-चिकेन, पुलाव और दूसरे व्यंजनों में भी इसे डालते हैं. इसलिए वहां मखाने की खूब खपत होती है. मगर पिछले दो साल से इस मांग में कमी आयी है. इसलिए यहां जो भरपूर उत्पादन हो रहा है, उसे बाजार नहीं मिल पा रहा. इस वजह से पिछले एक-दो साल से मखाने का बाजार अभूतपूर्व मंदी का शिकार है और इसका असर किसान से लेकर फोड़ी तक और व्यापारी तक हर किसी पर है.

मखान भूजता हुआ फोड़ियों का एक परिवार

इस साल मखान के किसान भी सकते में हैं. उन्हें अंदाजा नहीं है कि इस साल उनकी गुड़िया किस भाव से बिकेगी. रेट 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक जा सकता है. अगर फोड़ी इस भाव से खरीदेंगे तभी वे 200 रुपये प्रति किलो बेच कर अपने लिए कुछ पैसे बचा पायेंगे. मगर अगर गुड़िया का भाव इतना ही रहा तो किसानों को घर से घाटा लग जायेगा. इस तरह कोसी-सीमांचल के मखाने का भविष्य मिडिल ईस्ट के बाजार पर अटका है. वहां से मांग में तेजी आयेगी, तभी चार पैसे व्यापारियों, फोड़ियों और किसानों के हाथ में आयेंगे. वरना किसी न किसी को नुकसान उठाना पड़ेगा और वह इस लिंक से बाहर हुआ तो इस खूबसूरत, पौष्टिक और जायकेदार फल के दर्शन दुर्लभ हो जायेंगे.

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