कन्हैबा, गिरराज बाबू और बेगुसराय, ई बेकुफसराय थोड़े ही है

पुष्यमित्र

गिरराज बाबू नम्बर वन हैं, तनवीर हसन दू नम्बर पर और कन्हैबा तीन नम्बर पर। लिखकर रख लीजिये। यही फाइनल रिजल्ट होगा। कन्हैबा को गठबंधन का टिकट मिल गया होता तो जरूर वह आज आगे होता। अभी तो महागठबंधन लड़ रहा है, गिरराज बाबू को बैठे बैठे फायदा हो रहा है। कोई भुमिहार उमिहार कन्हैबा को वोट नहीं देगा। बेगूसराय है, बेकुफसराय थोड़े ही है। आ लेफ्ट भी पूरा कन्हैबा के साथ नहीं है। शत्रुघ्न बाबू खार खाए बैठे हैं। मीटिंग उटिंग में जाते जरूर हैं, मगर अन्दरे अन्दर काट तैयार कर रहे हैं। बारह आना कौमनिस्ट उनके साथ है। कन्हैबा को चार आना कौम्नीस्ट का भोट मिलेगा। अन्त में यही होगा। देख लीजियेगा। हां, हम पंडी जी हैं, सोचिएगा कि ई तो भाजपाईये होगा, तो दू चार ठो बैक्बर्ड से भी बतिया लिजिये।

मैं पटना आ गया हूं- गिरिराज

एक हफ्ते से इतना कन्हैया, गिरिराज और बेगूसराय हो रहा था कि मन किया जमुई की यात्रा छोड़कर एक बार बेगूसराय हो आयें। लेकिन जब मूड बना तो ट्रेन नहीं थी। फिर तय कार्यक्रम के मुताबिक सिमुलतला आना पड़ा। मगर दिल तो अटका था बेगूसराय में। लिहाजा वहां के कुछ नये पुराने पत्रकारों से फोन पर बतियाना पड़ा। उपर जिनका कमेंट है, वे बेगुसराय के एक पुराने पत्रकार हैं। नाम बताना ठीक नहीं होगा।

इनसे पहले मैंने एक नये पत्रकार से भी बात की। वे 8-10 साल के अनुभवी हैं। संयोग से वे भी ब्राह्मण देवता ही हैं। उन्होंने एक अलग रिपोर्ट बतायी। कहने लगे-

भैया, आगे रिजल्ट जो है मगर अभी जमीन पर कन्हैया ही आगे है। गिरिराज बाबू रूसे हुए हैं तो उनका काम ठप है। तनवीर हसन साहब भी बहुत ऐक्टिव नहीं हैं, दिनकर जी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाकर घर बैठ गये हैं। टिकट फाइनल होने का इन्तजार कर रहे हैं(उस वक़्त तक फाइनल नहीं हुआ था)। जबकि कन्हैया लगातार गांव गांव घूम रहा है, सबसे मिलजुल रहा है। यूथ उसके साथ है। लम्बे समय से यहीं है, इसका लाभ उसको जरूर मिलेगा।

भीड़ तो कन्हैया की सभा में भी उमड़ रही है

और राष्ट्रद्रोही की छवि?

मेरे इस सवाल पर उन्होने कहा, वह अब पुरानी बात हो गयी भैया। अभी तो वह यूथ आइकन है। सबसे बड़ी बात है लोकल है। बेगुसराय के लोग लोकल कैंडिडेट चाहते हैं। उसका फ्यूचर भी ब्राईट लग रहा है। भूमिहारों का भी उसको सपोर्ट है, लास्ट आवर में मुसलमानों का भी सपोर्ट मिल सकता है, वे लोग अभी फाईट देख रहे हैं।

इस दो तरह की टिप्पणियों से मैं चकरा गया। समझ नहीं आया कि कन्हैया नम्बर एक पर है या तीन पर। पटना के एक पत्रकार मित्र जो हाल ही में बेगुसराय से लौटे हैं वे भी कन्हैया की कैम्पेन प्लानिंग और चतुराई की तारीफ कर रहे थे। बेगुसराय में कार्यरत एक अन्य मित्र ने भी बताया कि कन्हैया युवाओं के बीच पॉपुलर हो रहा है। जाति धर्म से अलग उसके पक्ष में माहौल बन रहा है।

अब जमीनी सच्चाई जो भी हो, मगर यह तो सच है कि कभी लाल सलाम का गढ़ माना जाने वाला बेगुसराय 2019 के सुस्त और ठंडे चुनाव में सबसे हॉट सीट बन गया है। इसकी वजह दूसरों को पकिस्तान भेजने वाले भाजपा के फायरब्राण्ड नेता गिरिराज का रूठना है और कथित राष्ट्रद्रोही कन्हैया का उनको चुनौती देना है। कन्हैया लगातार राष्ट्रीय मीडिया में है। वह पूरे माहौल को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहा है। उसके विरोधियों में संघी और भक्त तो हैं ही, अम्बेडकरवादी भी उसको गरिया रहे हैं। कई वामपंथी भी ऐसे या वैसे कन्हैया की घेराबंदी कर रहे हैं।

हालांकि बिहार में भाजपा से इस बार सिर्फ गिरिराज ही नहीं रूसे हैं उनका पेटेंट वोटर भूमिहार भी रूठा नजर आ रहा है। मगर क्या यह सब बातें कन्हैया के फेवर में जा रही है? यह तो चुनावी नतीजे जी बतायेंगे। पर अगर गिरिराज को हरा कर कन्हैया इस बार जीत गया तो उसे राष्ट्रीय नेता बनने से कोई नहीं रोक सकता। मगर क्या इससे देश, समाज और बेगुसराय की सूरत बदलेगी।

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