कक्का कहते हैं, प्याज को छोड़िये पहले दूल्हा को सस्ता कीजिये

मिथिलेश राय

करिया कक्का तो कब से कह रहे थे कि आजकल लड़के बड़े महंगे हा गए हैं. लेकिन सब उनकी बात हँसी में उड़ा दिया करते थे. कक्का को बुड़बकी फील होने लगता था. लेकिन अब बिहार के सीएम साहब ने दहेज-कुप्रथा के खिलाफ आवाज बुलंद की है तो उन्हें थोड़ा बल मिलने लगा है. दिन-प्रतिदिन दूल्हे कितने महंगे होते जा रहे हैं यह बात सिर्फ बड़ी होती बिटिया के पापा को ही नहीं बल्कि पापा के पड़ोसियों यानी जिनसे समाज का निर्माण होता है, को भी पता है. लेकिन सबके पास अपनी-अपनी चुप्पी का खोल है, जिसमें इतनी गर्माहट है कि उसे उघारने की कभी इच्छा भी होती है, तो जैसे कोई हाथ पकड़ लेता है.

मिथिलेश कुमार राय की पहचान एक संवेदनशील कवि-कथाकार के रूप में है. जीवन में छोटी-छोटी चीजों के बीच खुशियां तलाश लेने की और उसके जाहिर करने की प्रवृत्ति उन्हें समकालीन लेखकों के बीच खास बनाती है. उनसे mithileshray82@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

ताज्जुब है न! यहाँ जब-जब महंगाई बढ़ती है कुछेक पल के लिए हंगामा हो जाता है. पेट्रोल के दाम बढ़े तो नारे लगे. डीजल के मूल्य में वृद्धि हुई तो जुलूस निकली. सुनते हैं कि एकबार प्याज का दाम बढ़ गया था तो सरकार ही डोल गई थी. माने समाज महंगाई को लेकर काफी संवेदनशील है. ये रोजमर्रा के उपयोग में आने वाली चीजों को सस्ती रूप में देखने के इच्छुक हैं. धरती पर महंगाई की कोई भी प्रक्रिया जनाक्रोश का एक कारण हो जाता है. निशाने पर सीधे सरकार आ जाती हैं. लेकिन इस क्रम में महंगे होते जा रहे दूल्हे को लेकर कहीं कोई आक्रोश नहीं. कहीं कोई जुलूस नहीं. कहीं प्रदर्शन नहीं. यहाँ तक कि आजतक कभी किसी सरकार को किसी भी मंच या सदन में किसी ने भी घेरने की पहल नहीं की कि देश भर में दूल्हे इतने महंगे होते जा रहे हैं, जिसके कारण पिता की परेशानियां इतनी बढ़ गई हैं कि वे न तो ठीक से खा-पी रहे हैं और न ही उन्हें रात को नींद ही आ रही हैं.

दूल्हे के महंगे हो जाने के कारण बेमेल शादियां हो रही हैं. लड़कियों को जिल्लत की जिंदगी जीनी पड़ रही हैं. कि उनके दिन की शुरुआत ताने से होती है. लड़की की मां का देह गला जा रहा है और जिनके घर सिर्फ बेटे हैं वे अपनी मूंछों पर ताव दे रहे हैं. इसका जबाव दे सरकार. लेकिन नहीं. इसका दंश सिर्फ वे पिता ही भोगने के लिए अभिशप्त हैं जिनकी बिटिया ब्याह योग्य हो रही हैं.

सरकार के पास तो पहले से ही एक कानून है. जिसमें बताया गया है कि दहेज का लेन-देन करना कानूनन अपराध है. इसके लिए सजा का भी प्रावधान है. वैसे सरकार का पहला काम है भी यही. कानून बनाना. सरकार की तरफ से चूक कहाँ हो रही है. अनुपालन में? तो क्या आमजन सिर्फ मिट्टी की मूरतें हैं? चूक तो दरअसल महंगाई की दुहाई देनेवाली इस आमजन की तरफ से ही हो रही है. कानून का अनुपालन हम नहीं करेंगे. तब शायद देवदूत आएगा ऊपर से. है न!

ये हो गया वो हो गया. ऐसा नहीं होना चाहिए और वैसा भी नहीं होना चाहिए. ऐसी बातें जितनी चाहें कर लें. लेकिन जब खुद की बारी आती है तो कहीं कोई चूं तक सुनाई नहीं पड़ती. कभी किसी बुजुर्ग ने मुझसे कहा था कि नदियां वगैरह क्या अभिशाप रहेंगी. अभिशाप तो अब हमारी बनाई नीतियां और कुरीतियां ही साबित हो रही हैं. कहो, निशाना मुनाफे पर और नजर सस्ती के जमाने पर हो तो बात कैसे बनेगी.

मैं शहर में था तो वहाँ महंगाई के खिलाफ आक्रोश देखता था. ज्यादातर बार विपक्ष की पार्टियों के कार्यकर्ताओं का जुलूस जैसा निकलते हुए देखता था. जिसमें वे महंगाई की जिम्मेदारी को सरकार पर थोपते हुए उनसे इस्तीफे की मांग किया करते थे. बढ़ी हुई महंगाई पर आमजन की प्रतिक्रिया की बाइटों को न्यूज चैनल वाले चलाते जिसमें महिलाएं ऐसा कहतीं कि अब तो घर चलाना भी मुश्किल हो गया है. जबकि पुरुषों की यह चिंता रहती कि महंगाई अगर इसी तरह बढ़ती रहेगी तो वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा कैसे दे पाएंगे.

चाय की दुकानों पर मैंने महंगाई के खिलाफ कामगरों को उबलते हुए देखा. कॉलेज के कैंटिनों में युवाओं को इसी के पक्ष-प्रतिपक्ष में झगड़ते भी देखा. मैंने देखा कि गाँव में खेत-खलिहान अगोरते लोग महंगाई की भयावहता को देखकर कलियुग की दुहाई दे रहे हैं. लेकिन महंगाई है कि कभी किसी की नहीं सुनी. सुनता आया हूँ कि देश और दुनिया में कैसी-कैसी तो भयावह नदियाँ थीं जो जब तब सैकड़ों गाँवों को लील लेती थीं. लेकिन जान और माल की रक्षा के लिए मनुष्य मस्तिष्क ने उसे भी बाँध दिया और उनसे भी रोजगार लेने लगा. लेकिन यहाँ आकर सब फेल हो गया.

महंगाई को बल कहाँ से मिलता है यह सब जानते हैं. सबको पता है कि मनुष्य की लिप्सा ज्यों ज्यों बढ़ती जाएगी महंगाई का कद भी बढ़ता जाएगा. फिर चाहे प्याज हो या दूल्हे राजा, महंगा और महंगा होते जाएगा.

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