एक था चुनाव आयोग! टीएन शेषन और केजे राव के जमाने वाला

आजकल चुनाव आयोग फिर बहसों में है. मगर इस बार बहस उसकी निष्पक्षता को लेकर नहीं उसके संदिग्ध फैसलों की वजह से है. यह सच है कि इन दिनों आयोग की साख गिरी है और उसके अधिकारी कमजोर नजर आ रहे हैं. इन बहसों के बीच मिथिला विवि की प्रोफेसर उस दौर को याद करते हुए कुछ सवाल उठा रही हैं, जिस दौर में टीएन शेषन, लिंगदोह और केजे राव जैसे अधिकारियों की सख्त निगरानी में चुनाव हुआ करते थे.

चंद्रमा देवी

मेरा देश बदल रहा है. दिन प्रतिदनि परिवर्तन की ओर आगे बढ़ रहा है. मानों जैसे देश में परिवर्तन की लहर दौड़ रही हो. यह परिवर्तन कोई साधारन परिवर्तन नहीं है, बल्कि इसकी स्पीड बुलेट ट्रेन भी तेज है. यही कारण है कि चुनाव आयोग (EC) भी बदल रहा है. घर वापसी करने की तैयारी कर रहा है. सशक्त संस्था होने के बाद भी वह अपंग और लाचार बन रहा है.

गुजरात चुनाव के बाद इतना तो तय हो गया है कि यह संस्था टीएन शेषन और केजे राव वाला आयोग नहीं है. यह वह आयोग नहीं है जो पीएम और एक सीएम को भी चुनौती दिया करता था. जिसके आदेश से अधिकारियों का तबादला कर दिया जाता था. एक तरह से कहा जाए तो चुनाव तिथि की घोषणा से लेकर काउंटिग होने तक वह सर्वोसर्वा अर्थात ऑलरांउडर हुआ करता था. हालांकि विगत हिमाचल प्रदेश चुनाव की तिथि घोषणा से लेकर गुजरात चुनाव संपन्न होने तक जिस प्रकार से चुनाव आयोग ने एक के बाद एक विवादास्पद निर्णय किए उससे संदेह उत्पन्न होता है. लगता है जैसे वह पुराने दौड़ में लौट रहा है.

कहने के लिए चुनाव आयोग एक स्वायत्त एवं अर्ध-न्यायिक संस्थान है जिसका गठन भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से भारत के प्रातिनिधिक संस्थानों में प्रतिनिधि चुनने के लिए किया गया था. इसकी स्थापना भले 25 जनवरी 1950 को कर दी गई थी, लेकिन यह संस्था लाचार और अपंग बनी रही. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू से लेकर चंद्रशेखर तक जिसने जैसा चाहा वैसे चुनाव आयोग का उपयोग किया. सीएम से लेकर सांसद और विधायक तक मनमर्जी करते नजर आते रहे. मानों चुनाव लोकतंत्र का पर्व नहीं बल्कि कुछ लोगों के लिए जश्न का माहौल हो.

इसी बीच नब्बे के दशक में टीएन शेषन नामक व्यक्ति चुनाव आयोग के आयुक्त पद पर बैठता है. पूर्व के चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली को देखकर उनके मन में कुंठा पैदा होती है. वह तय कर लेता है कि जैसा होता रहा है वैसे अब नहीं होगा. यहीं से शुरू होता है चुनाव आयोग का दूसरा जन्म. फिर क्या था चुनाव आयोग की लाठी निकली तो निकलती चली गई. फिर क्या था पीएम से लेकर सीएम और देश की जनता तक को पता चल गया कि चुनाव आयोग क्या होता है. उसके पास कौन कौन से पॉवर होते हैं. टीएन शेषन के बाद एमएस गिल ने उनके कार्य को आगे बढ़ाया. इसके बाद जे. एम. लिंगदोह, टीएस कृष्णमूर्ति, बीबी टंडन, एन गोपालस्वामी, नवीन चावला, शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी, वीएस संपत, एचएस ब्रह्मा और नसीम जैदी ने इस पद को संभाला और अपने स्टाइल से इस काम का आगे बढ़ाया.

यहां एक और व्यक्ति का नाम ना लिया जाए तो वह नाइंसाफी होगी. वह मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर तो नहीं बैठ पाया लेकिन चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में उसने अपनी एक अलग पहचान बनाई. बिहार जैसे लठंत राज्य में शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न कराकर उसने साबित कर दिया कि एक अधिकारी चाह तो क्या नहीं कर सकता. टीएन शेषन और एमएस गिल की तुलना किसी से की जा सकती है तो वह एकमात्र केजे राव है.

बिहार में लालू-राबड़ी का जंगलराज कायम था. जगह-जगह मतपेटी को या तो लूट लिया जाता था या मतदाता को धमका कर वोटिंग परसेंट को ब्रेक कर दिया जाता था. इसी बीच केजे राव बिहार आए. अपनी कार्यकुशलता से उन्होंने सबको चकित कर दिया. तभी तो बिहार के लोग और लालू समर्थक को भी यह कहना पड़ा कि लालू को नीतीश ने नहीं बल्कि केजे राव ने हराया है.

अब अंत में वर्तमान चुनाव आयुक्त के कार्यप्रणाली पर नजर डाल लेते हैं. विपक्ष सहित देश की जनता के मन में संदेह उत्पन्न होता है कि हिमाचल के साथ-साथ गुजरात चुनाव क्यों नहीं करवाया गया. जो चुनाव आयोग राहुल गांधी के इंटरव्यू पर त्वरित कार्रवाई करते हुए एक्श्न में आता है वह आयोग पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा कथित रूप से किए गए रोड शो पर चुप्पी साध लेता है. उल्लेखनीय है कि पीएम मोदी चाहते तो वोट गिराने के बाद अपने वाहन में बैठकर चुपचाप निकल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. घंटों पीएम का यह रोड शो विभिन्न टीवी चैनलों पर चलता रहा.

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