आपने सुना है लिट्टी-चोखा मेला का नाम

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चरित्रवन में खुले में लिट्टी पकाती महिलाएं

कल ही बक्सर का लिट्टी-चोखा मेला बीत गया. कई दिनों से योजना बना कर बैठा था, छुट्टी थी, फिर भी नहीं जा पाया. अब पता नहीं कब मौका मिले. अद्भुत है पंच कोसी मेले के आखिरी दिन बक्सर शहर में लगने वाला लिट्टी-चोखा का मेला. लोग बताते हैं कि उस रोज पूरे शहर में धुआं ही धुआं उठता रहता है. पंच कोसी यात्रा करने वाले तो जगह-जगह गोइखा सुलगाकर लिट्टी पकाते ही हैं, पूरे बक्सर शहर में हर घर में इसी तरह लिट्टी बनता है. मैं बस कल्पना ही कर सकता हूं कि कैसा माहौल रहता होगा.

वैसे तो अगहन महीने में लगने वाला पंच कोसी मेला अपने आप में ही अनूठा है. पांच दिनों तक चलने वाला यह मेला पांच अलग-अलग जगहों में लगता है. यात्री पहले दिन अहिरौली से यात्रा शुरू करते हैं, दूसरे दिन नदांव, तीसरे दिन भभुअर, चौथे दिन बड़का नुआंव तथा पांचवे दिन बक्सर के चरित्रवन में पहुंचते हैं. जहां लिट्टी-चोखा खाकर मेले का समापन किया जाता है. भोजपुर इलाके के इस प्रिय व्यंजन को इतने बड़े पैमाने पर शायद ही कहीं बनाया जाता होगा. लोग कहते हैं कि अगर आप उस रोज ऐसे ही बक्सर चले जाइये तो आपको कम से कम दस जगह लिट्टी खाना पड़ेगा. लोग पकड़-पकड़ कर आग्रह करके लिट्टी खिलाते हैं. इस मेले का जलवा तसवीरों और वीडियोज में देख सकते हैं.

इस मेले के पीछे कथा है कि भगवान राम विश्वामित्र मुनी के साथ सिद्धाश्रम आए थे. यज्ञ में व्यवधान पैदा करने वाली राक्षसी ताड़का एवं मारीच-सुबाहू को उन्होंने मारा था. इसके बाद इस सिद्ध क्षेत्र में रहने वाले पांच ऋषियों के आश्रम पर वे आर्शीवाद लेने गए. जिन पांच स्थानों पर वे गए. वहां रात्रि विश्राम किया. मुनियों ने उनका स्वागत जो पदार्थ उपलब्ध था, उसे प्रसाद स्वरुप देकर किया. कहा जाता है कि उसी परंपरा के अनुरुप यह मेला यहां आदि काल से अनवरत चलता आ रहा है. और हर पड़ाव का प्रसाद अपने-आप में अनूठा है. कहीं जिलेबी तो कहीं चूड़ा-दही तो कहीं सत्तू मूली.

इस मेले का पहला पड़ाव गौतम ऋषि का आश्रम है, जहां उनके श्राप से अहिल्या पाषाण हो गयी थी. उस स्थान का नाम अब अहिरौली है. इसे लोग भगवान हनुमान का ननिहाल भी कहते हैं. यहां जब भगवान राम पहुंचे. तो उनके चरण स्पर्श से पत्थर बनी अहिल्या श्राप मुक्त हुई. वैदिक मान्यता के अनुसार अहिल्या की पुत्री का नाम अंजनी था जिनके गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ. शहर के एक किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में अहिल्या मंदिर है. जहां मेला लगता है. यहां आने वाले श्रद्धालु पकवान और जलेबी प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं.

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पंचकोसी मेले का दूसरा पड़ाव नदांव में लगता है. जहां कभी नारद मुनी का आश्रम हुआ करता था. आज भी इस गांव में नर्वदेश्वर महादेव का मंदिर और नारद सरोवर विद्यमान है. यहां आने वाले श्रद्धालु खिचड़ी चोखा बनाकर खाते हैं. ऐसी मान्यता है कि नारद आश्रम में भगवान राम और लक्ष्मण का स्वागत खिचड़ी -चोखा से किया गया था.

इसका तीसरा पड़ाव भभुअर है जहां कभी भार्गव ऋषि का आश्रम हुआ करता था. भगवान द्वारा तीर चलाकर तालाब का निर्माण किया गया था. इस स्थान का नाम अब भभुअर हो गया है. यहां भार्गवेश्वर महादेव का मंदिर है जिसकी पूजा-अर्चना के बाद लोग चूड़ा-दही का प्रसाद ग्रहण करते हैं.

शहर के नया बाजार से सटे बड़का नुआंव गांव में चौथा पड़ाव लगता है. जहां उद्दालक मुनी का आश्रम हुआ करता था. यहीं पर माता अंजनी एवं हनुमान जी रहा करते थे. यहां सतुआ मुली का प्रसाद ग्रहण किया जाता है. पंचकोश मेले का पांचवा और अंतिम पड़ाव शहर के चरित्रवन में लगता है. जहां विश्वामित्र मुनी का आश्रम हुआ करता था.

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