आडवाणी की गिरिराज गति

पुष्यमित्र

हालांकि इस आलेख का शीर्षक थोड़ा अजीब है. भाजपा के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व लौह पुरुष और पूर्व फायरब्रांड संघी लालकृष्ण आडवाणी तकरीबन हर मामले में निवर्तमान फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह से सीनियर हैं. यहां तक कि उन्हें उस गति तक पहुंचाने की प्रक्रिया काफी पहले से चल रही है, जिस गति की तरफ गिरिराज सिंह को आज भेजा जा रहा है. मगर चूंकि मामला थोड़ा टटका है, इसलिए इस फिनॉमिनन को गिरिराज गति का नाम देने का ही मेरा मूड बन गया. गिरिराज गति नामक फ्रेज मेरे मन में काफी दिनों से किसी मुहावरे की तरह चुभला रहा है. काफी दिनों से सोच रहा था कि इस बारे में लिखूंगा, मामला टल रहा था. आज मौका मिल गया, जब खबर सुनी कि आदरणीय आडवाणी जी, भाजपा के मार्गदर्शक अगली लोकसभा के मेंबर भी नहीं रहेंगे.

सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के गृह राज्य में उनके नाम पर बनी लोकसभा सीट की यह त्रासदी रही है कि इस सीट पर ज्यादातर उनकी सोच से उलट सोच रहने वालों का प्रतिनिधित्व रहा है. खुद आडवाणी जो एक वक्त हिंदू गौरव के प्रतीक और भाजपा के फायरब्रांड नेता रह चुके हैं. छह दफा इस सीट से जीत चुके हैं. 1991 से आजतक सिर्फ दो साल ही ऐसा गुजरा होगा, जब वे गांधीनगर वासियों के जनप्रतिनिधि नहीं थे. मगर इस बार उनकी पार्टी भाजपा ने यह सीट एक वक्त उनके और वाजपेयी के इलेक्शन मैनेजर और आज के पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को दे दी है. यह उचित ही है, आखिर पूर्व फायरब्रांड नेता आडवाणी में आज न आग बची है, न चिंगारी. मुमकिन है कि बहुत जल्द भाजपा में आडवाणी की हैसियत वैसी ही हो जाये, जैसी कांग्रेस में पिछले दिनों पीवी नरसिंहा राव की थी. वहां उनका जिक्र करना भी अपराध मान लिया जायेगा.

एक जमाने में मोदी की राह का सबसे बड़ा कांटा बन चुके आडवाणी की ऐसी गति क्यों हुई यह समझा जा सकता है. मगर हमारे गिरिराज सिंह का क्या कसूर, वे तो मोदी का जैकारा लगाने वालों में से हैं. फायर ब्रांड भी हैं. हाल ही में उन्होंने अपने ही तेवर का बयान दिया था, जो मोदी की पटना की संकल्प रैली में नहीं आयेगा, वह राष्ट्रविरोधी होगा. मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने जैसे मशहूर नारे के जन्मदाता वही रहे हैं. फिर क्यों उनसे उनकी पसंदीदा सीट छीन ली गयी. उन्हें राष्ट्रविरोधी कन्हैया का मुकाबला करने के लिए बेगूसराय भेज दिया गया. खास तौर पर तब जब उन्होंने नवादा सीट को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था. टिकट कटने की खबर सुनी तो खटवास की तसवीर जारी कर दिये. फिर भी उनकी भावनाओं का ख्याल नहीं रखा गया. और तो और भाजपा के ही नेता सार्वजनिक मंचों पर गिरिराज की हंसी उड़ाने लगे.

मेरा सवाल यह है कि भाजपा जैसी हिंदुवादी पार्टी में फायरब्रांड हिंदुओं की यह गति क्यों है? क्यों समय बीतने पर, मतलब निकलने पर आडवाणी और गिरिराज जैसे नेता भुला दिये जाते हैं और याद रखने के लिए सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी और दीन दयाल उपाध्याय जैसे मध्यममार्गी और सॉफ्ट हिंदुत्व वाले नेताओं को चुना जाता है? क्या यह भाजपा की मजबूरी है कि वह उन्हीं नेताओं का सार्वजनिक सम्मान करे जिनकी सोच कुछ हद तक गांधी के करीब है या फिर पार्टी और उसके वैचारिक संगठन संघ के लिए फायरब्रांड, उग्र हिंदुत्ववादी नेता महज एक टूल हैं, क्षणिक रूप से वोट बैंक और आधार बढ़ाने के लिए? काम निकलने पर उन्हें इतिहास के तहखाने में फेंक दिया जाता है.

क्या इसी तरह किसी रोज मोदी, शाह और योगी जैसे आग लगाऊ नेताओं को भी पार्टी और संगठन इतिहास के तहखाने में फेंक देगी? क्योंकि भारत का ताना-बाना कुछ ऐसा है कि भाजपा कभी खुल कर उग्र हिंदुत्व सोच को लागू नहीं करा पायेगी.

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