आखिर कब तक जमीन सवालों से मुंह चुरायेगी राजनीति

हरेश कुमार

सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह की बातें तो ठीक है, लेकिन बिहार की चीनी मिलों, किसानों की बकाया राशि और वर्तमान स्थिति के बारे में भी कुछ कहना चाहेंगे? ओलावृष्टि से शिवहर जिला समेत बिहार के लाखों किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा है इसपर कोई एक शब्द नहीं बोल रहा. हवा-हवाई मुद्दों से आप ज्यादा तक राजनीति नहीं कर सकते. वास्तविक समस्याओं से कब तक मुंह चुराएंगे.

शिवहर अकेला जिला है जो रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ा है. शिवहर के नागरिकों को कहीं भी जाना हो तो रेल सेवा के लिए सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर या मोतिहारी जाना होता है. कई सालों से शिवहर में रेल सेवा की शुरू करने की बातें सुन रहे हैं, लेकिन जमीन पर होता कुछ नहीं है.

बिहार का यह अतिपिछड़ा जिला बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में आता है. नेताओं के कारण चालू हुए बागमती परियोजना ने इस क्षेत्र की मिट्टी को तो बर्बाद किया ही, क्षेत्र की जनता को दूसरे प्रांतों में मजदूर बनने को मजबूर कर दिया. बागमती पर बांध बनने से पहले यह इलाका काफी उपजाऊ था और यहां की मिट्टी सोना उपजाती थी.

खैर, नेतागीरी को धंधा बनाने वालों से क्या उम्मीद करना. वो तो पांच साल में एक बार वोट मांगने आते हैं और बाढ़ के समय क्षेत्र की जनता को कुछ मिले या न मिले इनको कमीशन घर बैठे मिल जाता है. इतना ही नहीं, ऐसे लोग हेलिकॉप्टर से बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करके अपना सौभाग्य समझते हैं. बेशर्म लोगों को शर्म भी नहीं आती है.

मैं बेलवाघाट (शिवहर) का निवासी हूं. 1987 से पहले हमारा गांव काफी समृद्ध था, लेकिन नेताओं की नज़र लगी और बागमती नदी पर बांध बांधने का कार्य शुरू हुआ. फिर क्या था? देखते ही देखते हमारे खेतों में उपजाऊ मिट्टी की जगह बालू हो गया. जिस नदी में सालोंभर पानी उपलब्ध होता था और कोई भी व्यक्ति गमछा लगाकर मछली मार सकता था, गर्मियों में धूल उड़ने लगा है, बालू के कारण खाना भी सही से नहीं खा सकते. नदी में मछली देखे जमाना हो गया. खेतों में परवल, तरबूज, अलुआ, केला के अलावा धान-गेहूं और मक्के की फसल भरपूर होती थी. ठेकेदारों, अधिकारियों, नेतागीरी के धंधे में लगे लोगों की ये सब भेंट चढ़ गए. इलाके के जमींदार और किसान बर्बाद हो गए तो वहीं नेतागीरी के धंधे में लगे लोगों की सात पुश्तों की गरीबी बागमती परियोजना की बदौलत एक ही झटके में दूर हो गई, जिनके पास एक साइकिल खरीदने को पैसे नहीं थे, वो आज हेलिकॉप्टर से चल रहे हैं.

कटाव के कारण हर साल-दो साल बाद घर नदी की धारा में बह जाता है और हम सभी एक बार फिर से सड़क पर आ जाते हैं. नेताओं का क्या है उनके लिए बाढ़, सुखाड़, भूकंप जैसी आपदा तो बहार लेकर आती है. इन गिद्धों को इंतजार रहता है जैसे इस तरह के प्राकृतिक हादसों का.

चुनाव के समय गिद्धों की तरह मंडराने वाले नेतागीरी के धंधे में लगे लोग चुनाव खत्म होते ही गदहे के सिंग की तरह से गायब हो जाते हैं. लोकतंत्र के नाम पर क्षेत्र की जनता के साथ यह भद्दा मजाक आखिर कब तक चलेगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दैनिक जागरण से जुड़े हुए हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं.)

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