अब कमर लचकाने वाली नहीं, समाज बदलने वाली हीरोइन चाहिए भोजपुरी फिल्मों को

यह सीतामढ़ी की मुखिया रितु जायसवाल की सांकेतिक तसवीर है, जो अपने क्षेत्र में काफी अच्छा काम कर रही हैं.

धनंजय कुमार

भोजपुरी फ़िल्मों के दर्शक पूरे बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो हैं ही, मुम्बई से लेकर विदेशों में भी हैं, लेकिन फ़िल्में इतनी गैर प्रोफेशनल तरीके से बनती हैं कि फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग भोजपुरी फिल्मों से दूर रह जाता है. पढ़ा-लिखा तबका भोजपुरी फ़िल्में देखना पसंद नहीं करता. कम पढ़ी-लिखी और लोअर क्लास महिलायें भी सिनेमाघरों में आकर भोजपुरी फ़िल्में देखना पसंद नहीं करतीं और इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भोजपुरी फिल्मों में औरतो की भूमिका सेक्स भड़काने वाले दृश्यों से इतर नहीं हो पातीं.

धनंजय कुमार, भोजपुरी फिल्मों के जाने-माने स्क्रिप्ट राइटर. इस लिंक पर जाकर पढ़िये, धनंजय कुमार का एक और विचारोत्तेजक आलेख
जो भोजपुरी फिल्म मुम्बई के बीस-बीस थियेटरों में लगती है, उसे पटना वाले एक शो तक नहीं देते

हीरोइनें हीरों के साथ नाचने-गाने और फूहड़ बातें करने भर के लिए होती हैं, जबकि बिहार-यूपी के समाज में औरतों की भूमिका बदली है. लडकियां पढ़ रही हैं, महिलायें अकेली शहर बाजार आने जाने लगी हैं और यहां तक कि राजनीति में भी उनकी सक्रियता बढ़ी है. बिहार में तो पंचायत चुनावों में 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित की जा चुकी हैं. कुल मिलाकर कहें, तो महिलायें अब सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रही हैं बल्कि परिवार से लेकर गाँव और समाज तक में दखल देने लगी हैं, निर्णय लेने लगी हैं.

इसलिए जरूरत है कहानी और स्क्रिप्ट के स्तर पर महिलाओं के रोल को निखारने और मजबूत बनाने की. बिहार-यूपी की लडकियां अब सरकारी- गैर सरकारी नौकरियों में भी जाने लगी हैं. टीचर से लेकर पुलिस और नर्स से लेकर खिलाड़ी तक लडकियां बन रही हैं. मोटे शब्दों में कहें तो हमारा समाज काफी बदला है और तेजी से बदल रहा है.

भोजपुरी फिल्मों को भी बदलने की जरूरत है. और इस बदलाव को लेखक के बिना संभव और रचनात्मक नहीं बनाया जा सकता. लेखक को महत्व देना होगा. उनकी जरूरत को समझना होगा. उनको ठीक ठाक फीस देनी होगी. फिल्म निर्माण में उनका दखल बढ़ाना होगा.

भोजपुरी फिल्म के निर्माताओं और वितरकों को यह बात समझनी होगी कि भोजपुरी फिल्मों का बिजनेस बढ़ाये बिना अब ज्यादा दिन सरवाइव मुश्किल है. जिस तरह की फिल्मों पर पिछले एक दशक से दांव खेल रहे हैं, उसमें अब सेचुरेशन आ गया है. कमाई घट रही है और सिनेमा घर बंद हो रहे हैं. इसलिए बिजनेस को बचाना है तो फिल्मों में स्क्रिप्ट के स्तर पर गंभीर बदलाव लाना होगा. सिर्फ हीरो के कंधे पर बैठ कर मजा लेने के दिन लद रहे हैं.

ये ठीक है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींचकर लाने का काम स्टार करते हैं, लेकिन सिनेमाघर में उन्हें बिठा कर रखने और फिर वापस परिवार के साथ बुलाने का काम स्क्रिप्ट राइटर ही कर सकता है. लोग सिर्फ हीरो को देखने नहीं आते हैं, बल्कि कहानी और ड्रामा देखने आते हैं. और अच्छी कहानी और अच्छा ड्रामा अच्छा लेखक ही रच सकता है.

अच्छा लेखक से अभिप्राय उस लेखक से है, जिसकी समाज और देश दुनिया में हो रहे बदलावों पर बारीक नजर हो, जो परिवारों और रिश्तों के बदलते मायने को देखने की तीक्ष्ण दृष्टि रखता हो और जो समाज में सकारात्मक दिशा दे पाने की कल्पनाशीलता रखता हो. साथ जिसे स्क्रिप्ट रेटिंग का हुनर मालूम हो. सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है. यह जीवन और समाज की विसंगतियों और विशेषताओं के अन्तर को समझने का भी माध्यम है.

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