अकोला में जमीन पर उतर गये यशवंत, क्या यह लड़ाई रंग लायेगी?

P.M.

दो दिन पहले पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री किसानों की लड़ाई का साथ देने अकोला पहुंच गये. वे वहां उनके साथ जमीन पर सोये नजर आये. बाद में पुलिस ने उन्हें और उनके 250 समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया और थाने में पांच घंटे रखा. दिलचस्प है कि यह लड़ाई एक ऐसे राज्य महाराष्ट्र में हो रही है, जहां भाजपा सत्ता में है. और उनकी किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ एक वरिष्ठ भाजपा नेता सड़कों पर है. सरकार न उनकी बात सुनने को तैयार है और न ही कोई उनसे मिलने अकोला पहुंचा है. वे इस लड़ाई को लंबा खीचने में जुट गये हैं. खबर है कि आज उनका साथ देने अरुण शौरी, वरुण गांधी और शत्रुघ्न सिंहा अकोला पहुंचने वाले हैं. दिल्ली के सीएम केजरीवाल और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें समर्थन दिया है. आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता टोपी लगाये वहां नजर आ रहे हैं. यशवंत ने उद्धव ठाकरे और शरद पंवार से भी समर्थन मांगा है. अब सवाल यह है कि यह घटनाक्रम क्या इशारा कर रहा है? क्या भाजपा के विक्षुब्धों ने मोदी के नेतृत्व के खिलाफ सड़क पर जंग छेड़ दी है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि यह लड़ाई कितनी लंबी खिचेगी, क्या इसका कोई नतीजा निकलेगा?

किसानों के समर्थन में जमीन पर लेटे यशवंत की तसवीर इन दिनों वायरल है

ऐसा नहीं है कि यशवंत सिंहा पहली बार अपनी ही सरकार को घेर रहे हैं. पिछले कई महीनों से वे लगातार मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं और बिल्कुल तीखे सवाल. नोटबंदी और जीएसटी पर तो उन्होंने सरकार की फजीहत तक करवा दी है. उसी तरह अरुण शौरी भी इस सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं. शत्रुघ्न सिंहा का भी वही हाल है. हाशिये पर ढकेल दिये वरुण गांधी मुखर तो नहीं हुए हैं, मगर उनकी असहमतियां जाहिर हैं. मगर अब तक यह सब काम मीडिया में बयानबाजी के तौर पर होता रहा है और ये चारो कभी एक मंच पर नहीं आये हैं. यह पहला मौका है कि भाजपा के ये चार राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता अपनी ही सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं. वह भी उस नागपुर के करीब जहां संघ का मुख्यालय है.

हालांकि यह कोई नया मामला नहीं है और मोदी सरकार इन विरोधों को झेलने की अभ्यस्त है और इन्हें मात देने में माहिर हो गयी है. चाहे अखलाक की हत्या का मामला हो, रोहित वेमुला, गौरी लंकेश की हत्या से उठा विवाद हो, गोरखपुर में बच्चों की मौत, बीएचयू में लड़कियों का प्रदर्शन, जंतर-मंतर पर किसानों का प्रदर्शन औऱ भी ऐसे दसियों मामले हैं. मोदी सरकार 2014 से ही लगातार विपक्षियों के हमले की जद में रही है. कई ऐसे मौके आये हैं, जब लगता है कि मोदी सरकार घिर गयी है. मगर वह इन विपरीत स्थितियों से अपनी तरह से निकल आती है. इसकी वजह यह है कि कांग्रेसियों और वामपंथियों के प्रति लोगों के मन में बहुत अच्छी धारणा नहीं है. जब भी मोरचे पर ये नजर आते हैं तो इनके खिलाफ आरोपों की झड़ी लग जाती है. सोशल मीडिया में ये ट्रोल होने लगते हैं. हिंदुत्व का मसला भी अक्सरहां भाजपा को बचा ले जाता है. सोशल मीडिया पर मोदी के भक्तों की टोली ऐसे मौके पर उन्हें मजबूती से डिफेंड करती है.

मगर इस बार मामला अलग है. इस बार लड़ाई की अगुआई न कांग्रेसी कर रहे हैं, न वाम बुद्धिजीवी. इस बार लड़ाई की कमान भाजपाइयों के ही हाथ में है. और ये भाजपाई उन लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिन्होंने बेहतरी की उम्मीद में मोदी को वोट दिया था, मगर उनके कारपोरेट परस्त और किसान विरोधी, आम आदमी विरोधी नीतियों के कारण ठगे महसूस कर रहे हैं. वे अब तक मोदी को इसलिए डिफेंड करते रहे हैं, क्योंकि वे बाहरी हमलों से(उनके लिए कांग्रेसी-वामबुद्धिजीवी राष्ट्र विरोधी, हिंदू विरोधी हैं) मोदी को बचाना अपना फर्ज समझते हैं. मगर इस बार हमला अंदर से हो रहा है.

हालांकि वहां किसानों का मुद्दा कोई बहुत बड़ा नहीं है. वहां के किसानों को पिछले साल की दाल की कीमत अब तक अदा नहीं की गयी है. कपास का रेट पांच हजार रुपये तय किया गया था, उसे भी लागू नहीं कराया जा रहा है. मगर देवेंद्र सरकार यशवंत सिंहा के आगे झुकने को तैयार नहीं है. संभवतः दिल्ली से यही मैसेज गया होगा. इसलिए मामला उग्र हो रहा है.

हां, देवेंद्र फड़णवीस ने इस बीच किसानों की कर्ज माफी योजना पर काम कराना शुरू कर दिया है. फर्स्ट पोस्ट के मुताबिक साढ़े नौ लाख किसानों के खाते में 54 हजार करोड़ जमा कराये जा चुके हैं. फड़णवीस सरकार ने कहा है कि अगले दस दिनों में 40 से 48 लाख किसानों के खाते में पैसे पहुंचेंगे. जाहिर सी बात है कि यह रणनीति इस बात की है कि राज्य के किसान यशवंत सिंहा के आंदोलन से नहीं जुड़ें. वे कर्ज माफी की रकम अपने खाते में डलवाने की कोशिशों में उलझे रहें. मगर क्या अपनी इन कोशिशों से फडणवीस किसानों का गुस्सा कम करने में कामयाब हो पायेंगे. क्या यह आंदोलन उठने से पहले ही ध्वस्त हो जायेगा. यह देखने की बात होगी.

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